वर्तमान समय साधनों के विस्तार में बहुत चले गये हैं और सार जो साधना है उसमें थोड़ी कमी पड़ गई है। अभी बाबा हमसे चाहता है कि बच्चों की साधना ऐसी पक्की हो जो कोई भी साधन हमको हिला न सकें। मान लो अभी हम शांत में बैठे हैं, लाइट चली गई। तो ऐसे नहीं यही संकल्प चलता रहे कि लाइट क्यों गई? लाइट के दफ्तर वाले अच्छे नहीं हैं, काम करते ही नहीं, आजकल के हैं ही ऐसे… परन्तु मेरा काम यह नहीं है कि हम उनका सोचें। ऐसे फालतू कॉमन संकल्प हमारे चल गये तो साधन ने मेरे मन की स्थिति को खींच लिया। मन की स्थिति एकाग्र नहीं हुई, तो साधना पॉवरफुल नहीं रही। साधना तो हम सब करते हैं और साधना चलते-फिरते भी हो सकती है लेकिन साधन के वश न हो, स्थिति कमल पुष्प समान हो।
कई बार हम कर्म कॉन्शियस हो जाते हैं, बॉडी कॉन्शियस भी नहीं होते, सोल कॉन्शियस भी नहीं हैं, कर्म कॉन्शियस हो जाते हैं जैसे कि यह काम ऐसे करना है, यह किया, यह ठीक हुआ, यह नहीं हुआ… ऐसे नैचुरल कर्म कॉन्शियस का संकल्प चलता है लेकिन जिस कर्म का अभ्यास है वह कर्म करते हुए हम साधना में रहें। हाथ-पांव का जो काम है, वह बहुत हल्का है तो उसमें बुद्धि को शिवबाबा के तरफ एकाग्र होके लगा सकते हैं। थोड़ा भी टाइम मिला तो हम अपनी साधना में गुम हो सकते हैं। गुम होना माना ऐसे नहीं कि सिर्फ अशरीरी हो जाएं, लेकिन इसके साथ कन्ट्रोलिंग पॉवर भी चाहिए। अगर हमारी साधना अच्छी है तो कोई भी उल्टा काम मेरे से नहीं हो सकता है।
जैसे ट्रैफिक कन्ट्रोल के समय हम टाइम निकालते हैं, ऐसे हम बीच-बीच में थोड़ा समय सभी निकालें तो साधना का अनुभव कर सकते हैं लेकिन इसमें अटेन्शन और अभ्यास चाहिए, मन पर कन्ट्रोलिंग पॉवर चाहिए। लेकिन कन्ट्रोलिंग पॉवर तब आयेगी जब यह मुझे निश्चय हो कि मैं मालिक हूँ, आत्मा हूँ। उस मालिकपने के नशे से आप स्वयं को कन्ट्रोल कर सकते हो।
जिनका एक बाबा से दिल का प्यार है उनको याद की मेहनत नहीं करनी पड़ती। बस, बाबा कहा और बाबा में समा गये, यानी लव में लीन हो गये। यह लवलीन अवस्था ऐसी है जो दो अलग-अलग होते भी एक हैं। लवलीन माना लव में एकदम समा जायें और कुछ नज़र नहीं आये। जैसे सागर में खो गये तो वह लवलीन अवस्था जो है वह प्यारी और ऊंची है। कर्म का बन्धन चाहे पास्ट का, चाहे वर्तमान का लेकिन खींचे नहीं। कर्म करें लेकिन न्यारे होकर कर्म भी पूरा करें और जिसके साथ कर्म में आते हैं, उसके भी प्यारे बनें और बाबा के भी प्यारे बनें। इसे ही विदेही अवस्था भी कहा जाता है। अभी भी साधना करने का समय है। लेकिन जब हलचल शुरू हो जाएगी तो उस हलचल का सामना करने में भी टाइम देना पड़ेगा। उस समय अभ्यास नहीं होगा फिर साधना नहीं कर सकेंगे और हलचल में टिक नहीं सकेंगे इसीलिए बाबा बार-बार भिन्न-भिन्न रूप से इशारा दे रहा है। एक तो कर्म के बन्धनों को चेक करो, एकदम मैं क्लीन हूँ? किसी भी तरफ लगाव तो नहीं है? कोई गुण या कोई स्वभाव के प्रति किसी से विशेष आकर्षण तो नहीं है? सच्ची और पॉवरफुल साधना के लिए हमारे मन का लगाव कहाँ भी नहीं होना चाहिए। मन बुद्धि को क्लीयर रखना – यह साधना के लिए बहुत ज़रूरी है।




