मुख पृष्ठब्र.कु. शिवानीअपना सुख-दु:ख कोई और नहीं, हम ही रचते हैं…

अपना सुख-दु:ख कोई और नहीं, हम ही रचते हैं…

हम सभी के संस्कारों को नहीं समझ सकते। जो संस्कार मेरे पास नहीं होगा, मैं उसे कभी समझ नहीं सकती। तो हमें समस्या ये होती है कि आप ऐसा कैसे कर सकते हो, यह मैं समझ नहीं पाता। जबकि समझने से अच्छा है कि हम स्वीकार कर लें कि उनका संस्कार अलग है। समझना मतलब मैं आपके संस्कारों को अनुभूत करूं। इस समझना शब्द को हटाएं और उसको स्वीकार से बदल दें।

हम आहत होते हैं रिश्तों में। किसी ने कुछ ऐसा किया, कुछ करा, जो मेरे अनुसार नहीं था तो मैंने मन में चोट निर्मित कर ली – यू हर्ट मी। हम सभी के पास एक नाम है, जिसने आपको आहत किया था कभी। अब पता करते हैं किसने हमें हर्ट किया। जैसे मैं बोल रही हूँ और कोई उठकर बाहर चला जाए। मैंने अपेक्षा की थी कि कोई बीच में से उठकर नहीं जाएगा। अगर कोई उठकर जाता है तो उनके पास उसके लिए कोई न कोई कारण होगा। लेकिन मैंने सोच बना ली कि उन्होंने मेरा अपमान किया।हम चीज़ों को इसी तरह से रिकॉर्ड करते हैं मन में। फिर हम कहते हैं कि इसने मेरा तिरस्कार किया, उसने मेरी अवमानना की। जबकि लोग सिर्फ वही कर रहे हैं जो उनको सही लगता है। उसके लिए उनके पास कारण हैं। लेकिन क्योंकि उनका कर्म हमें सही नहीं लगता, इसलिए हमने मन में रिकॉर्ड कर दिया कि उन्होंने मेरा अपमान किया।

लोगों के जो संस्कार हैं, उसके अनुसार वो कर रहे हैं। लेकिन उनको देखते हुए हम अपने मन में क्या रिकॉर्ड करते हैं, वो हमारा चयन है। मान लें कि किसी को देखकर मैंने अपने मन पर यह दर्ज कर लिया कि उन्होंने मेरा अपमान किया। किसी दूसरे अवसर पर उन्हें देखा तो मेरी धारणा पहले ही बनी हुई थी। तो मैंने फिर से यह विचार रच दिया कि यह व्यक्ति मेरा अपमान करता है। तब यह विचार मेरा संस्कार बनता चला जाता है। हमें बहुत ही सचेत रहना चाहिए कि हम मन में क्या दर्ज कर रहे हैं। एक और उदाहरण देखें। आपने सुबह नाश्ते में कुछ बहुत अच्छी चीज़ बनाई। आप छह बजे से मेहनत कर रही थीं। पतिदेव आये। डायनिंग टेबल पर बैठे। एक हाथ में फोन, एक हाथ में पेपर। कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं दी। आपने पूछा, कैसा है खाना? तो उन्होंने कह दिया, अच्छा है, लेकिन मेरी मम्मी जितना अच्छा नहीं बना। अब वो तो यह बात बोलकर चले गए। लेकिन आपके मन के अन्दर अब शुरू हो गया – मैं सुबह छह बजे उठी, रात को नाइट डयूटी करके आई, इनके लिए इतना बनाया। इस घर में तो मेरी कोई वैल्यू ही नहीं हैं। कितनी भी मेहनत कर लो ये सुनने को मिलता है ऊपर से। कोई फायदा ही नहीं है इनके साथ।

ये सारी बातें कौन बोल रहा है? आपका मन ही ना? उन्होंने एक लाइन बोली थी, आपने कितनी लाइन बोल दीं! फिर मन इतना भारी हो गया तो मम्मी को फोन किया, बहन को फोन किया, फ्रेंड को फोन किया, और सबको पूरी कथा सुनाई। ये सारा कुछ करके अपने मन का दर्द ही और बढ़ाया। चोट किसने रची थी? और चोट को ठीक करने के बजाय उलटे उसी को कौन बढ़ाते रहा? साक्षी होकर इस बात पर विचार कीजिएगा।

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