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नरसिंहपुर: समर कैंप के समापन और परिवार दिवस पर ब्रह्माकुमारीज़ में हुआ भव्य आयोजन: बच्चों ने ली माता-पिता को वृद्धाश्रम न भेजने की प्रतिज्ञा

नरसिंहपुर,मध्य प्रदेश। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के स्थित ‘दिव्य संस्कार भवन’ (हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी) में आज एक दोहरा उत्सव मनाया गया। यहाँ बच्चों के लिए आयोजित किए गए विशेष समर कैंप(Summer Camp)का सफलतापूर्वक समापन हुआ और साथ ही ‘विश्व परिवार दिवस’ के पावन अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित ब्रह्माकुमारी कुसुम दीदी ने अभिभावकों को संबोधित करते हुए बच्चों में नैतिक और आध्यात्मिक संस्कारों के सिंचन पर विशेष बल दिया।
उद्घाटन और समर कैंप के समापन पर दीं शुभकामनाएं
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कुसुम दीदी ने कहा, “आज समापन नहीं, बल्कि जीवन में नए श्रेष्ठ संस्कारों के उद्घाटन का दिवस है।” उन्होंने समर कैंप को सफलतापूर्वक पूरा करने वाले प्यारे बच्चों, उनके माता-पिता और ईश्वरीय परिवार के सभी भाई-बहनों को ‘परिवार दिवस’ की दिल से हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि इस समर कैंप का उद्देश्य बच्चों को कला और खेल-कूद के साथ-साथ जीवन जीने के सच्चे संस्कार सिखाना था।
संस्कारों का महत्व और राजयोग
दीदी ने अभिभावकों को प्रेरित करते हुए कहा कि परिवार हमारा पहला विद्यालय और पहला मित्र होता है। माता-पिता स्वयं केंद्र पर आएं, राजयोग की अनुभूति करें और अपने जीवन को दिव्य बनाकर वही श्रेष्ठ संस्कार अपने बच्चों को सौंपें। उन्होंने कहा, “आजकल के बच्चे बौद्धिक रूप से बहुत विकसित हैं। उन्होंने इस समर कैंप के दौरान भी डांस, भाषण, ड्राइंग, पेंटिंग और खेल-कूद जैसी अपनी बाहरी प्रतिभाओं को बहुत ही सुंदर तरीके से निखारा है। लेकिन इन प्रतिभाओं के साथ-साथ बच्चों का भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से संस्कारी बनना भी बेहद जरूरी है।”
उन्होंने माता-पिता से आग्रह किया कि बच्चों को बचपन से ही आध्यात्मिक ज्ञान दिया जाना चाहिए, इसके लिए वे सप्ताह में कम से कम एक दिन अपने बच्चों को ‘संस्कारों की इस पाठशाला’ अवश्य लेकर आएं ताकि समर कैंप में सीखे गए मूल्य हमेशा बने रहें।
दीदी ने कोमल पौधे का उदाहरण देते हुए समझाया, “10 से 15 साल तक की उम्र ही संस्कार निर्माण की सही उम्र होती है। जैसे एक कोमल पौधे को यदि लाठी का सीधा सहारा दिया जाए तो वह सीधा बढ़ता है, और यदि टेढ़ा छोड़ दिया जाए तो वह टेढ़ा ही बड़ा हो जाता है। इसी तरह बच्चों के इन कोमल संस्कारों को अभी सही और सीधे सहारे की जरूरत है, जिससे उनका भविष्य उज्जवल हो सके।”
बच्चों का नाटक और मर्मस्पर्शी प्रतिज्ञा
समर कैंप के समापन के अवसर पर बच्चों द्वारा एक बेहद भावुक और संदेशात्मक नाटक की प्रस्तुति दी गई। इस नाटक में संयुक्त परिवार में दादा-दादी और नाना-नानी के महत्व एवं उनकी विशेषताओं को बखूबी दर्शाया गया। नाटक के अंत में समर कैंप के सभी बच्चों ने एक सुर में यह मर्मस्पर्शी प्रतिज्ञा ली कि—”हम बड़े होकर अपने माता-पिता को कभी वृद्धाश्रम नहीं भेजेंगे।”
इस प्रसंग को रेखांकित करते हुए कुसुम दीदी ने सभी पालकों से भावुक अपील की कि यदि अभिभावक भी भविष्य में वृद्धाश्रम जैसी परिस्थितियों से बचना चाहते हैं, तो उन्हें अपने बच्चों को अभी से संस्कारवान बनाना होगा।
कार्यक्रम के अंत में दीदी ने समर कैंप के यादगार पलों की सराहना करते हुए सभी बच्चों के उज्जवल भविष्य की कामना की और ‘ओम शांति’ के साथ अपने वक्तव्य को विराम दिया। इस गरिमामयी कार्यक्रम में बहिन सुश्री भारती कोठारी, भ्राता रामगोपाल नेमा सेवा निवृत शिक्षक सिंहपुर, भ्राता टेक सिंह पटेल पूर्व शिक्षक ने कार्य क्रम की सराहना करते हुए शुभकामनाएं दी।
बच्चों ने समर कैंप के प्रेरणा दाई अनुभव साझा किए।
अन्त में जिला संचालिका ब्रह्माकुमारी कुसुम दीदी ने समर कैंप में प्रतिभागी बच्चों को फर्स्ट सेकंड थर्ड सहित सभी बच्चों को पुरुस्कार दे कर प्रोत्साहित किया ।
इस अवसर पर लगभग 150 स्थानीय नागरिक, प्रबुद्ध जन, माता-पिता अविभावक गण एवं बीके भाई बहिन उपस्थित रहे।

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