बाबा ने कहाँ-कहाँ से ढूंढ के टीचर बनाया है। कोई को किस कोने से, किसको किस कोने से चुना, कमाल तो बाबा की है जो हमको चुना और टीचर बनाया, अभी हमको क्या करना है? जो बाबा की आशायें हैं हमारे लिए वो पूर्ण करनी हैं क्योंकि टाइम का तो कोई भरोसा नहीं है। अचानक का पाठ तो बाबा कितने समय से सुना रहे हैं, तो हमको क्या बनना पड़ेगा? एवररेडी। समय को हम नहीं देखें, समय का इंतज़ार नहीं करना है लेकिन अपना इंतज़ाम सदा के लिए करना है। कोई भी समय सेकण्ड में आज आ जाए, कुछ भी हो जाए तो हम एवररेडी रहें। कल विनाश हो जाए तो तैयार हैं? तैयार तो हो जाएंगे लेकिन जो बाबा कहता है समान, सम्पन्न बनें वो तैयारी है? क्योंकि हमको बाबा के साथ राजधानी में आना है। ऐसे नहीं कहाँ भी आये, आयेंगे तो सही वो तो शरीर छूटना ही है। लेकिन नहीं जो लक्ष्य बाबा का है, टीचर को बाबा कितना बड़ा स्वमान देता है, गुरुभाई। बच्चा भी नहीं कहता है, भाई कहता है जो भाई-भाई होते हैं वो समान होते हैं। तो इतना टाइटल बाबा देता है उस टाइटल के अनुसार अपने को चेक करें। बाबा ने कहा है ब्रह्मा बाबा के समान और सम्पन्न बनने का लक्ष्य रखो। तो रोज़ अपने आपको चेक करें कि आज जो दिन बीता ब्रह्मा बाप के समान और सम्पन्न बीता? रात को सोने से पूर्व बाबा को सारे दिन का पोतामेल सुनाओ। दिनचर्या के प्रमाण हमारा क्या-क्या हुआ, वो रिज़ल्ट बाबा को सुनाना है। अच्छी बात यह है कि मानो हमारे से छोटी-मोटी गलती हो गयी, संस्कार मिलाने मेंं, कभी बिन्दी लगाने में देरी हो जाती है तो बाबा को फौरन सुनाकर बाबा से माफी ले लो क्योंकि बाबा कहते टीचर बनकर कोई धर्मराजपुरी में जाये यह बाबा को अच्छा नहीं लगता है। मानो आपने गलती की तो बाबा को दे दिया ना, तो दी हुई चीज़ कभी वापस नहीं ली जाती है। वो बुरा माना जाता है, मानो आप कोई चीज़ किसी को दे दो और फिर गलती से वह आपके पास आ जाए तो क्या आप उसे अपनी अलमारी में रखेंगे? नहीं, क्योंकि अब वह दूसरे की हो गई। तो ऐसे ही जो चीज़ हमने बाबा को दे दी वो दी हुई चीज़ फिर वापस नहीं ली जाती है। इसको पाप कहा जाता है। इसीलिए जो भी कुछ है बाबा को दे दिया फिर वापस नहीं लेना। नहीं तो इसका बहुत हिसाब-किताब बनता है।
तो टीचर माना अपने को सदा एवररेडी रखना, आज भी विनाश हो जाये तो मैं तैयार हूँ! ऐसे नहीं थोड़ा-सा रहा हुआ है, कभी-कभी लेकिन विनाश तो अचानक होना है। इसलिए बाबा कहते हैं अपनी कोई भी कमज़ोरी बाबा को दे दो, तो दी हुई चीज़ फिर आपके पास वापस आयेगी, तो भूल से भी वापस नहीं लेना।
टीचर माना एक तो पहले निमित्त भाव, मैंपन नहीं। थोड़ा ही भाषण बहुत अच्छा करते हैं तो समझते हैं मैंने तो, मैंने तो… अरे, बाबा ने कराया, तुमने क्या किया? तो मैंपन नहीं हो इसके लिए बाबा कहते हैं निमित्त भाव हो। कुछ भी हुआ लेकिन अच्छाई में मैंपन ज़रूर आता है, अच्छा किया तो दिल में आता ज़रूर है कि मैंने बहुत अच्छा भाषण किया, मेरे से जिज्ञासु बन गया। लेकिन बाबा ने टच किया या आपने किया! आप तो निमित्त बनी ना, तो एक निमित्त दूसरा निर्मान क्योंकि आपस में इक_े रहते हैं ना, उसमें एक जैसे भी होते हैं तो थोड़ा-सा आ जाता है… मैं भी कम नहीं, यह अभिमान आ जाता है। और तीसरा निर्मल वाणी। कभी-कभी वाणी से भी जो आता वो बोल देते हैं फिर कहेंगे मेरा भाव नहीं था लेकिन ऐसे ही बोल दिया। भाव था तभी तो निकला ना! तो यह तीन बातें बाबा ने अटेन्शन खिंचवाने के लिए कहा है, तो निमित्त भाव ज़रूर होना चािहए।
टीचर माना निमित्त भाव, मैं पन नहीं
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