बाबा आज हम बच्चों से क्या चाहते हैं?
आज संसार में ज्ञान की कमी नहीं है। मनुष्य ने विज्ञान, तकनीक और भौतिक उपलिब्धयों में अद्भुत प्रगति की है। आध्यात्मिक क्षेत्र में भी लोग प्रवचन सुन रहे हैं, पुस्तकें पढ़ रहे हैं, मेडिटेशन सीख रहे हैं और जीवन को बेहतर बनाने के अनेक प्रयास कर रहे हैं। फिर भी एक सच्चाई हमारे सामने बार-बार आती है – थोड़ी सी परिस्थिति आते ही मन अशांत हो जाता है, छोटी-सी बात में क्रोध आ जाता है और संबंधों में तनाव पैदा हो जाता है। ऐसे में एक गहरा प्रश्न उठता है – यदि हम वर्षों से शांति और आत्मज्ञान सुन रहे हैं तो फिर वह हमारे जीवन का स्थायी अनुभव क्यों नहीं बन पा रहा?
यहीं आज परमात्मा शिव बाबा हम बच्चों को एक बहुत महत्वपूर्ण दिशा देना चाहते हैं। बाबा चाहते हैं कि हम केवल ज्ञान के विद्यार्थी बनकर न रहें, बल्कि अनुभवीमूर्त बनें। केवल सुनना, पढऩा और बोलना ही पर्याप्त नहीं है; अब समय अनुभव की अथॉरिटी जमा करने का है।
बाबा बार-बार कहते हैं कि ब्राह्मण जीवन के चारों विषय – ज्ञान, योग, धारणा और सेवा सिर्फ पढऩे या समझने के लिए नहीं है, बल्कि उन्हें जीवन में अनुभव करने के लिए हैं। ज्ञान तब तक अधूरा है जब तक वह हमारे व्यवहार में दिखाई न दे। योग तब तक सम्पूर्ण नहीं जब तक वह हमारी स्थिति को स्थिर और शक्तिशाली न बना दे। धारणा तब तक वास्तविक नहीं जब तक गुण स्वाभाविक न बन जाएं। और सेवा तब तक प्रभावशाली नहीं जब तक हमारी वाणी और वायब्रेशन दूसरों को शांति का अनुभव न कराएं।
आज बाबा हमसे केवल ”योग लगाने” की नहीं, बल्कि ”योगी जीवन जीने” की अपेक्षा रखते हैं। योग लगाना एक अभ्यास हो सकता है लेकिन योगी जीवन एक निरंतर अवस्था है। जैसे सांस लेना हमारे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है वैसे ही आत्म स्मृति और परमात्म स्मृति भी सहज बननी चाहिए। यदि याद में बैठने के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़े तो यह संकेत है कि अभी प्रेम की गहराई बढ़ानी है। क्योंकि जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ मेहनत अनुभव नहीं होती।
बाबा हमें यह भी समझाते हैं कि हमें अपने पुराने संस्कारों और कमज़ोरियों से लडऩा नहीं है। अंधकार को हटाने के लिए अंधकार से युद्ध नहीं किया जाता, केवल प्रकाश का स्विच ऑन किया जाता है। उसी प्रकार यदि हम अपने स्वमान में स्थित हो जाएं – ”मैं शांत स्वरूप आत्मा हूँ, मैं मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा हूँ” – तो देहभान, भय और अशांति का अंधकार स्वत: समाप्त होने लगता है।
आज का समय तेजी से बदल रहा है। परिस्थितियां अचानक बदलती हैं, मानसिक तनाव बढ़ रहा है और संसार अनिश्चितता की ओर बढ़ता दिखाई देता है। इसलिए बाबा बार-बार बच्चों को क्रक्रएवररेडीञ्जञ्ज बनने का संकेत दे रहे हैं। एवररेडी होने का अर्थ केवल तैयारी करना नहीं, बल्कि ऐसा अनुभव जमा करना है कि संकल्प करते ही आत्मा उसी स्वरूप में स्थित हो जाए। परिस्थिति आने पर सोचने का समय नहीं मिलता; उस समय वही अनुभव काम आता है जो हमने पहले से अपने भीतर पक्का किया है।
बाबा चाहते हैं कि हमारा स्वमान इतना सहज और स्वाभाविक बन जाए जैसे हमें अपना नाम याद रहता है। हमें अपने नाम को याद करने की मेहनत नहीं करनी पड़ती, क्योंकि वह हमारी पहचान बन चुका है। उसी प्रकार आत्मा का स्वरूप भी हमारी सहज अनुभूति बन जाना चाहिए।
आज दुनिया को केवल बोलने वाले लोग नहीं चाहिए, बल्कि ऐसी अनुभवी आत्माएं चाहिए जिनकी उपस्थिति से शांति का अनुभव हो। इसलिए बाबा हम बच्चों को अब केवल पुरुषार्थी नहीं, बल्कि अनुभवीमूर्त बनाना चाहते हैं।
आइए, हम स्वयं से यह संकल्प करें –
हम केवल ज्ञान सुनने वाले नहीं बनेंगे, बल्कि ज्ञानस्वरूप बनेंगे।
हम परिस्थितियों से लड़ेंगे नहीं, बल्कि स्वमान का स्विच ऑन करेंगे। और ऐसा योगी जीवन जियेंगे, जो स्वयं भी शांत हो और संसार को भी शांति का अनुभव कराए।
ज्ञान से अनुभव तक की आध्यात्मिक यात्रा
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