मुख पृष्ठब्र.कु. शिवानीसिर्फ एक आप, अपने आपसे प्रेम से बात कर लो, तो सदा...

सिर्फ एक आप, अपने आपसे प्रेम से बात कर लो, तो सदा खुश रहेंगे

कलियुग का मतलब है – चाहिए की स्थिति। देवी-देवताओं का युग सतयुग देने की अवस्था वाला युग है। कलियुग तक पहुंचते-पहुंचते जो हाथ देने की स्थिति में था, वही हाथ लेने की स्थिति वाला बन जाता है। कभी भी किसी के भी सामने लेने की स्थिति में खड़े नहीं होना कि आप कुछ करो जिससे मुझे अच्छा महसूस हो। लेकिन मेरी अनुभूति मेरा चयन है, वह किसी और के व्यवहार पर निर्भर नहीं है। तो मुझे कौन आहत कर सकता है? मैं स्वयं। तब मुझसे किसे माफी मांगनी चाहिए? स्वयं मुझे ही। तो आज रात को सोने से पहले अपने आपको सॉरी बोलना। सॉरी कि मैंने तुम्हें कितना कष्ट दिया है इतने साल। आज से एक चीज़ पक्की करना – पूरी दुनिया भी अगर आपसे प्यार से बात नहीं करे सिर्फ एक आप, अपने आपसे प्रेम से बात कर लो – तो सदा खुश रहेंगे जीवन भर।
इसका विपरीत भी सच है। पूरी दुनिया भी अगर आपसे प्यार से बात करे लेकिन आप अपने से प्यार से बात नहीं करते, तो आप कभी खुश नहीं हो सकते। तो रात को सोने से पहले अपने आपको क्षमा करना। और उन सबको जिनको आपने अपने मन में पकडक़र रखा था, उनको भी आज से ही छुट्टी दे देना। इसको कहा जाता है मुक्ति। यही है मुक्ति कि रिलीज पीपुल एंड लेट देम गो(लोगों को रिहा करो और जाने दो)। क्योंकि पकडक़र रखने से मेरा सर्कल डार्क होता जाएगा। हमें अपने सर्कल को साफ करना है।
आप एक चीज़ देखना। दूसरों सेे बात करके मन हल्का नहीं होता है। अगर मन को हल्का करना है तो बात समाधान की करो, तभी वह हल्का होगा। लेकिन समस्याओं पर ही बातें करतेे रहो तो मन हल्का नहीं होगा। बल्कि और भी ज्य़ादा भारी हो जाएगा। क्योंकि निगेटिविटी अब सिर्फ मेरे पास नहीं, मैंने आपके भी चित्त पर रख दी। तो उससे तो रिश्ता और जटिल होता जाएगा। कोई भी गलत नहीं है। सभी अपने-अपने नज़रिये से सही हैं। हम उनको दुआयें देकर उनके संस्कारों को बदलें। अपेक्षाएं रखने के बजाए उनको स्वीकारें। तब मुझे कोई दु:खी नहीं कर सकता।
आजकल एक नया रिवाज बना है। कभी भी, कहीं भी, कुछ थोड़ा-सा मतभेद हो जाए तो हम बात करना ही बंद कर देते हैं एक-दूसरे से। घरों में भी। हमें लगता है कि बात नहीं करने से हीलिंग होती है अन्दर। नहीं, उल्टे ऐसा करके हम बहुत भारी निगेटिव थॉट्स रचते हैं एक-दूसरे के लिए। उसका सीधा असर घर पर, परिवार के हर सदस्य पर पड़ता है।
अपने घर का एक कल्चर बनाएं, अपने कार्यस्थल का एक कल्चर बनाएं। मतभेद हैं तो सामने आएंगे ही। कभी-कभी कुछ बात भी हो जाएगी। तब तुरंत उसे नॉर्मल करें। ये नहीं कि हमें अब बात ही नहीं करनी है एक-दूसरे से। क्योंकि सच यह है कि अंदर से तब सिर्फ उनसे ही बात चल रही होती है। हैवी निगेटिव एनर्जी। आप जो घर का कल्चर बनाएंगे, आपके बच्चों का जीवन आगे उसी पर आधारित होने जा रहा है।
इसलिए इन सब चीज़ों को लेकर बहुत सावधान रहें। अबोला रिश्तों में बहुत ज्य़ादा दूरियां ले आता है, क्योंकि हम बहुत निगेटिव वाइब्स एक-दूसरे को भेज देते हैं। ऐसा करके न हम अपना भला करते हैं, न दूसरों का और ना ही उनका जिन्हें हम सच में प्यार करते हैं।

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