मुख पृष्ठलेखमर्यादा, योग और समर्पण की साकार प्रतिमा - दीदी मनमोहिनी जी

मर्यादा, योग और समर्पण की साकार प्रतिमा – दीदी मनमोहिनी जी

प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के इतिहास में कुछ आत्माएं ऐसी रही हैं, जिन्होंने अपने तप, त्याग, अनुशासन और परमात्म प्रेम से ईश्वरीय यज्ञ को नई दिशा और शक्ति प्रदान की। राजयोगिनी दीदी मनमोहिनी जी ऐसी ही महानविभूति थीं। उनका जीवन सादगी, मर्यादा, समय की पाबंदी और श्रीमत पर अटल चलने का अद्भुत उदाहरण था। वे केवल एक प्रशासक नहीं थीं बल्कि आध्यात्मिक जीवन को व्यवहार में उतारने की जीवंत कला थीं।

दीदी मनमोहिनी जी प्रारम्भिक दिनों से ही ब्रह्मा बाबा और शिव बाबा के बेहद निकट रहीं। उन्होंने ईश्वरीय ज्ञान को केवल सुना नहीं, बल्कि अपने प्रत्येक कर्म और संस्कार में उसे उतारकर दिखाया। वे एक प्रतिष्ठित परिवार से थीं, किन्तु परमात्मा की पहचान होने के बाद उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन ईश्वरीय सेवा में समर्पित कर दिया। उनके जीवन में त्याग का भाव इतना सहज था कि कभी भी उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को महत्व नहीं दिया। उनके लिए सबसे बड़ा लक्ष्य था – ”बाबा की श्रीमत पर चलकर विश्व परिवर्तन के कार्य में सहयोगी बनना।”
जगदम्बा सरस्वती मम्मा के अव्यक्त होने के बाद यज्ञ की बड़ी जि़म्मेदारी दादी प्रकाशमणि जी और दीदी मनमोहिनी जी के कंधों पर आई। दोनों ने मिलकर अत्यंत सुंदर रीति से सम्पूर्ण प्रशासन को संभाला। दादी प्रकाशमणि जी जहाँ स्नेह और ममता का स्वरूप थीं, वहीं दीदी मनमोहिनी जी मर्यादा, अनुशासन और सूक्ष्म प्रशासन की प्रतिमा थीं। दोनों की आपसी एकता इतनी गहरी थी कि वे अलग शरीर होते हुए भी एक ही संकल्प में बंधी हुई प्रतीत होती थीं। उनका एक ही लक्ष्य था -”जो बाबा ने सिखाया है, उसके अनुसार चलना और चलाना।”
दीदी मनमोहिनी जी समय की अत्यंत पाबंद थीं। उनका सम्पूर्ण जीवन एक अनुशासित तपस्विनी के समान था। अमृतवेला, योग, मुरली, सेवा और दिनचर्या – हर कार्य अत्यंत सटीकता और नियमितता से होता था। वे मानती थीं कि आध्यात्मिक जीवन में समय और मर्यादा का बहुत महत्व है। वे स्वयं भी हर नियम का पालन करती थीं और दूसरों को भी बड़े प्रेम से प्रेरित करती थीं।
उनकी विशेषता यह थी कि वे किसी को डांट कर नहीं, बल्कि आत्मीयता और व्यावहारिक समझ से परिवर्तन कर देती थीं। यदि कोई विद्यार्थी मुरली क्लास में अनुपस्थित रहता या सेवा में ढीलापन करता, तो वे तुरंत उसका ध्यान आकर्षित करतीं और समझातीं कि स्वयं परमात्मा शिक्षक बनकर हमें ज्ञान दे रहे हैं, इसलिए इसमें कभी लापरवाही नहीं होनी चाहिए। उनके शब्दों में कठोरता नहीं, बल्कि आत्मिक जि़म्मेदारी का भाव होता था।
दीदी मनमोहिनी जी की एक और महान विशेषता थी – व्यावहारिक आध्यात्मिकता। वे केवल सिद्धांत नहीं बतातीं थीं, बल्कि जीवन की परिस्थितियों में आध्यात्मिकता को कैसे जीना है, यह सिखाती थीं। गृहस्थ जीवन में रहने वाले विद्यार्थी को वे ऐसा संतुलित मार्गदर्शन देती थीं कि वे परिवार और जि़म्मेदारियों के बीच भी योगयुक्त और शांत रह सकें।
प्रशासनिक क्षेत्र में उनकी सूक्ष्म दृष्टि अद्भुत थी। भारत और विदेशों में बढ़ती सेवाओं के बीच भी वे इस बात का विशेष ध्यान रखती थीं कि यज्ञ का प्रत्येक कार्य श्रीमत और मर्यादाओं के अनुसार हो। उनके लिए प्रशासन केवल व्यवस्था नहीं बल्कि एक पवित्र ईश्वरीय सेवा थी।
उनसे मिलने वाला प्रत्येक व्यक्ति उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था। वे कम बोलती थीं, लेकिन उनके चेहरे की गंभीरता में गहरा प्रेम और आत्मीयता झलकती थी। वे सभी को सम्मान देती थीं और हर आत्मा की भावनाओं को समझने का प्रयास करती थीं।
आज उनकी पुण्य तिथि पर उनका जीवन हमें यही प्रेरणा देता है कि सच्चा राजयोगी जीवन वही है, जिसमें अनुशासन हो, नम्रता हो, योग हो और हर कर्म परमात्मा की स्मृति में किया जाए। दीदी मनमोहिनी जी का सम्पूर्ण जीवन मानो यह संदेश देता है – ”मर्यादाओं में रहकर, योगयुक्त होकर और श्रीमत पर चलकर ही जीवन श्रेष्ठ बनता है।”
उनकी पुण्य स्मृति हम सभी को सदैव ईश्वरीय मार्ग पर आगे बढऩे की प्रेरणा देती रहे।

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