जब अपने स्वरूप की स्मृति आ गई तो वहाँ समस्या क्या होगी…!!!

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ओम् शांति का एक शब्द मंत्र कहने से ही अपने स्वरूप की स्मृति याद दिलाता है। दूसरा बाबा शांति का सागर है उसकी स्मृति दिलाता है और तीसरी बात अपना घर शांतिधाम उसकी स्मृति दिलाता है। तो जब भी हम ओम् शांति शब्द बोलते हैं तो हमें तीनों ही स्मृति आती हैं और स्मृति से समर्थी आती है। कैसी भी समस्या हो लेकिन तीनों ही याद आ जावें- स्वयं का रूप, बाप और अपना घर, अगर यह तीनों बातें आप अभी एक सेकण्ड में याद करो, अनुभव करो तो क्या कोई समस्या आपके आगे ठहर सकती है? जहाँ बाबा याद आ गया, अपने घर की याद आ गई, अपने स्वरूप की स्मृति आ गई वहाँ समस्या क्या होगी? लेकिन ओम् शांति तो कह देते हैं, अर्थ स्मृति में नहीं आता है। तो कभी भी कोई भी समस्या आवे, जैसे आग लगती है तो फौरन क्या याद आता है? पानी। ऐसे जब हम ओम् शांति कहते हैं और स्मृति स्वरूप हो जाते हैं, तो स्वत: ही सारी समस्यायें खत्म होंगी। जैसे यहाँ अन्धियारा हो जाये और हम लाइट का स्विच ऑन करें तो अंधकार स्वत: ही चला जाता है ना! लाइट का आना अंधकार का स्वत: ही जाना। ऐसे ही यह भी अभ्यास अगर करो तो कोई भी बात आवे, तो अर्थ सहित तीनों याद से ओम् शांति कहो तो समस्या ठहर नहीं सकती है। ऐसा अनुभव है?
बाबा ने हम टीचर्स को गुरूभाई कहा है, गुरू के भाई, इतनी बड़ी सीट दी है ना! सभी मुरली सुनाते हैं ना! गुरू की जो गद्दी है, मुरली सुनाने की, वो बाबा ने किसको दी? टीचर को। कोई भाई व कोई स्टूडेन्ट कहे हम भी रोज़ मुरली सुनायें तो आप देंगी, नहीं ना! टीचर को ही देते हैं इसलिए बाबा हमको गुरूभाई कहता है, तो बाबा ने महिमा भी की है टीचर्स की कि मेरे समान हैं, गुरूभाई हैं, लेकिन बाबा इशारा देता कि जो कुछ कहते हो उसका पहले अनुभव हो। मैं आत्मा हँू, शरीर अलग है, आत्मा अलग है लेकिन आत्मा जिस समय अनुभव होगी, तो आत्म-अभिमानी बनने से ऑटोमेटिकली सेकण्ड में बाप के साथ कनेक्शन स्वत: ही जुट जायेगा। हम सब टीचर बनें क्यों? सरेंडर हुए क्यों? जब हम समर्पण हुए बाबा के प्रति तो सबसे पहले हमको बाबा के प्यार ही ने आकर्षित किया ना! ज्ञान तो पीछे समझा, चाहे बहनों द्वारा बाबा ने दिया, दादियों द्वारा दिया या टोली द्वारा मिला क्योंकि कईयों को टोली भी प्रेम की आकर्षण करती है। लेकिन पहले-पहले परमात्म प्यार ने आपको आकर्षित किया। तो उसी प्यार में कोई खोये रहें तो आप सोचो उनकी स्थिति कितनी ऊँची और श्रेष्ठ होगी! फिर ऐसों के आगे समस्या और संस्कार क्या हैं, कुछ नहीं क्योंकि यही दो बातें सबको परेशान करती हैं जिसको कहते हैं हम चाहते नहीं हैं लेकिन मेरी नेचर ही ऐसी है। तो पहले यह सोचो कि समस्यायें क्यों आती हैं? पुरूषार्थ तीव्र क्यों नहीं होता है? कमज़ोरियाँ क्यों आती हैं? और चाहते भी हैं खत्म हो लेकिन नहीं हो पाती,तो उसका कारण क्या है? आत्म-अनुभूति की कमी है। अपने को आत्मा समझ बाबा को याद करने के अभ्यास की कमी है। तो इस अभ्यास को हमें बढ़ाना है।

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