विश्व में परिवर्तन कैसे आयेगा?

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संसार बिगड़ गया है। बिगड़ गया का मतलब या तो पुराना हो गया या संसार में सार न रहा, या फिर मनुष्य के संस्कार में खराबी आ गई। यही तो हमें देखना है। तभी तो उन्हें ठीक कर पायेंगे। इसे जब तक ठीक न किया जाये तो ये तो वैसा का वैसा ही रहेगा। इसे बदलना तो पड़ेगा ना! बदलना क्या है, हमारे में आई विकृतियां- जैसे संस्कार, स्वभाव, व्यवहार और सोच। ऐसे ही तो विश्वकल्याण होगा अन्यथा तो इस संसार का अकल्याण ही बना रहेगा। इस पर ज़रा गौर करते हैं…!

सब कहते हैं कि विश्व में परिवर्तन आना चाहिए, शान्ति की स्थापना होनी चाहिए। कैसे परिवर्तन आयेगा? क्या छू मंत्र से या किसी जादू से? कितना बड़ा विश्व है! बाप की बात बेटा नहीं मानता, बेटे की बात बाप नहीं मानता, पति की बात पत्नी नहीं मानती, पत्नी की बात पति नहीं मानता। एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते हैं। ऐसी स्थिति में संसार कैसे बदलेगा? ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय कहता है कि संसार बदल जायेगा। कलियुग चला जायेगा और सतयुग आ जायेगा। क्या कलियुग ऐसे ही चला जायेगा? नहीं। तरीका अपनाना पड़ेगा। उसके लिए बाबा ने क्या तरीका बताया है? स्व-परिवर्तन से विश्व-परिवर्तन। बाबा का यह तरीका अति तार्किक है, कोई भी उसकी आलोचना नहीं कर सकता, उसको काट नहीं सकता, इसे अकाट्य प्रमाण कहते हैं।
संसार का एक सबसे बड़ा मौलिक नियम है ”करूणा और परिणाम”। बिना कारण कोई परिणाम नहीं होगा। अगर कोई परिणाम है माना ज़रूर कोई कारण है। इतिहास पढ़ते हैं, कोई जीत गया, कोई हार गया। भारतवासी हार गये और मुसलमान जीत गये। इसके लिए इतिहास में कई कारण बताये गये हैं कि वे क्यों जीते और वे क्यों हारे। विज्ञान भी यही कहता है और दर्शन भी यही कहता है कि जैसे बीज बोओगे, वैसे फल पाओगे। डॉक्टर्स भी यही कहते हैं। अगर आप डॉक्टर के पास जाकर कहोगे कि मेरे पेट में दर्द है तो डॉक्टर पूछेगा कि क्या खाया था? ज़रूरत से ज्य़ादा खा लिया होगा इसलिए पेट खराब हो गया। कोई न कोई कारण ज़रूर है, तब तो यह परिणाम निकला। इसलिए जब तक कारण नहीं ढूँढेंगे तब तक निवारण कैसे कर सकेंगे? संसार के कुछ शाश्वत नियम हैं जो हर एक को अनुसरण करने पड़ते हैं।
उसी प्रकार, संसार में दु:ख और अशान्ति है तो उसके कारण क्या हैं? दु:ख और अशांति तो परिणाम हैं ना, फल हैं ना! इनका बीज क्या है? कारण क्या है? बाबा हमें समझाते हैं कि उनका कारण है, मनुष्य के बुरे कर्म। जैसे करोगे, वैसे पाओगे। यहाँ तक तो सबने बताया। बहुत लोगों ने बताया। लेकिन हम शुरू इसके बाद करते हैं, वे कहते हैं कि कर्म अच्छे होने चाहिए लेकिन कर्मों का आधार क्या है, वे नहीं जानते। कर्मों का आधार हैं तीन चीज़ें। एक, मनुष्य के संकल्प। कोई भी कर्म हम करने लगते हैं तो पहले संकल्प आता है। कोई भी कर्म, चाहे मन्सा हो, वाचा हो या कर्मणा हो, उसका कारण या मूल है- विचार या संकल्प। दूसरे हैं संस्कार। पहले की हमारी जो मान्यतायें हैं, संस्कार हैं उनका विचारों पर प्रभाव पड़ता है। तीसरी है, स्मृति। कोई आपका मित्र एक बात कहता है कि यह करो। आत्मा में स्मृति पड़ी रहती है कि हमारा मित्र है, इसकी बात माननी पड़ेगी, यह काम करना हमारा फर्ज बनता है। अगर यह स्मृति न हो तो हमारा हाथ कर्म करने के लिए उठेगा ही नहीं। इस प्रकार, संकल्प(विचार), संस्कार और स्मृति- ये तीनों मिलकर कर्म का आधार बनते हैं। इनको ठीक किये बगैर कर्म ठीक नहीं होंगे और कर्म ठीक किये बगैर फल नहीं होंगे। विश्व का परिवर्तन करने के लिए इनका परिवर्तन करना ज़रूरी है। इसके बगैर विश्व का परिवर्तन नहीं होगा।
विचार, आचार का मूल है-
क्या विचार आना चाहिए और क्या विचार नहीं आना चाहिए, क्या पॉजि़टिव विचार है और क्या निगेटिव विचार है, शुभ विचार क्या है और अशुभ विचार क्या है, कल्याणकारी विचार क्या है और अकल्याणकारी विचार क्या है, इसका ज्ञान होना चाहिए। कहा गया है कि क्रविचार, आचार का मूल हैञ्ज जैसे सोचोगे, वैसे बनोगे। इसलिए बाबा हमारे विचारों को बदलते हैं। कैसे बदलते हैं? विचार को बदलने के लिए विचार देते हैं। जैसे काँटे को काँटा निकालता है। कहते हैं कि काँटे को निकालने के लिए काँटा ही चाहिए। सूई भी तो एक काँटा है। वह काँटा कुदरत से बना हुआ है और यह मनुष्य का बनाया हुआ है। जैसे आपने देखा होगा कि कारपेंटर कील को निकालने के लिए दूसरी कील का इस्तेमाल करता है,क्योंकि कील को निकालने के लिए कील ही चाहिए। उसी प्रकार विचार को निकालने के लिए विचार अथवा शुभ संकल्प, श्रेष्ठ संकल्प कहते हैं। बाबा की ये सब मुरलियाँ क्या हैं? ये सब श्रेष्ठ विचार हैं, पॉजि़टिव थॉट्स(शुभ विचार) हैं, गोल्डन थॉट्स(स्वर्णिम विचार) हैं। बाबा की सारी शिक्षायें क्या हैं? श्रेष्ठ विचारों का समूह हैं, शुभ विचारों का संग्रह हैं। बाबा क्या विचार देते हैं? मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा ज्योति बिन्दु हूँ। पहले हमारा विचार क्या था? मैं शरीर हूँ, मैं पुरूष हूँ, फलाने देश का रहने वाला हूँ। अभी बाबा ने क्या विचार दिया? मैं आत्मा हूँ, निराकार हूँ, परमधाम का रहवासी हूँ। न पुरूष हूँ, न स्त्री हूँ, मैं एक ज्योति बिन्दु आत्मा हूँ। गलत विचार को निकालने के लिए बाबा ने हमें ये श्रेष्ठ विचार दिये। जिस विचार से कर्म बिगड़ गये हैं, संसार खराब हुआ है उसको जब तक निकालेंगे नहीं, तब तक संसार कैसे अच्छा होगा? जो श्रेष्ठ विचार बाबा ने दिये हैं, उनका नाम है ‘ज्ञान’। उनको हम कहते हैं शिक्षा। बाबा सदा संग रहे तुम्हारी शिक्षा…। बाबा ने हमें कौन-सा विचार दिया? मैं कौन हूँ, किसकी सन्तान हूँ! अभी तक तो हम लौकिक पिता को ही अपना पिता समझकर बैठे थे। अभी मालूम पड़ा कि वह तो शरीर का पिता है। मुझ आत्मा का पिता तो परमात्मा है। बाबा ने आकर यह नया विचार दिया, नया ज्ञान दिया, नयी शिक्षा दी। अब मालूम पडऩे से हमारे विचार बदल गये, विचार बदलने से वह कर्म बदलने का साधन बन जायेगा।

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