मन की बातें

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प्रश्न : मेरा नाम सुबाराव है। ठीक जैसे ही दस बजते हैं वैसे ही मेरी नींद उड़ जाती है। फिर एक-दो बज जाता है, तो लाख कोशिश करने के बाद भी मुझे नींद नहीं आती। मैंने बहुत सारे लिटरेचर भी पढ़े हैं, मैं इस विद्यालय से भी जुड़ा हुआ हूँ, लेकिन मैं अपनी इस समस्या से बहुत परेशान हूँ। इससे मेरा सुबह बहुत प्रभावित होता है। कृपया बतायें क्या करूँ?

उत्तर : ये ऐसी आपके ब्रेन की स्थिति बन गई है कि जैसे ही आप सोने जायेंगे तो सब्कॉन्शियस माइंड फुली एक्टिव हो जायेगा और आपको सोने नहीं देगा। कुछ भी विचार आपको आने लगेंगे। कुछ चीज़ याद आने लगेगी। तो तेल भी अच्छे-अच्छे मार्केट में आ गये हैं।एक छोटी-सी विधि मैं बताता हूँ, तेल कोई भी जो सिर पर लगाते हो उसको एक हरी शिशी में रखकर सूरज की किरणों में रखें आठ से दस घंटे। एक हफ्ते तक रख लें तो ये तेल एक बहुत अच्छी मेडिसिन बन जायेगा। इसको लगा लेंगे तो बहुत गहरी नींद आने लगेगी। नींद न आने के और भी कई कारण हो सकते हैं। पूर्व जन्मों के कर्म, कोई बैड एनर्जी आपके पीछे लगी हो, किसी की आपने बहुत नींद फिटाई हो। उनकी बैड एनर्जी आपके पीछे लगी हो जो आपको सोने नहीं देती। कर्मों की गति ये भी कहती है कि आपने किसी की नींद फिटा दी हो और आपको उनसे बद्दुआएं मिल गई हों कि जैसे हम नींद का सुख नहीं ले पा रहे वैसे ही आप भी नींद का सुख नहीं ले पाओगे। ऐसे ही पिछले जन्मों के पाप कर्म ज्य़ादा हो गये हों और वो आपको सोने नहीं देते हों, एक्टिव हो गये हों तो आपको उनसे क्षमा-याचना करनी चाहिए। और दिन में एक घंटा स्पेशल योग करना चाहिए। ताकि जो पास्ट के विकर्म एक्टिवेट हो गये हैं वो नष्ट हो जायें। और बाकी जो हमने विधि बताई वो आपको करनी है। क्षमा याचना आपको बहुत बल देगी। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि राजयोग का अभ्यास करना शुरू किया और तत्काल नींद आना शुरू हो जाये। इसमें थोड़ा टाइम भी लग सकता है। लेकिन अगर लगातार अभ्यास और पुरुषार्थ करते रहें तो निश्चित रूप से आप इसमें सफल अवश्य होंगे।

प्रश्न: मैं सतपाल चौधरी रूड़की से। केदारनाथ घाटी के पिछले भीषड़ त्रासदी के बाद कई लोग लापता हो गए थे। अब जानकारी मिल रही है कि कंकाल मिल रहे हैं जिन्होंने सम्भवत: ठण्ड और भूख प्यास से दम तोड़ा होगा। लेकिन मेरा प्रश्न ये है कि जो लोग जल प्रलय में मारे गए या जो बच गए। जो भूख-प्यास से मरे या जिनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया क्या वो आत्मायें भटक गई होंगी? या उन्हें पुनर्जन्म मिल गया होगा। क्योंकि हिन्दु धर्म में ये मान्यता है कि जबतक अंतिम संस्कार न किया जाये तब तक आत्मा भटकती रहती है।

उत्तर : ये सोचना आपका स्वाभाविक है क्योंकि जब ऐसी चीज़ें सामने आती हैं, प्राकृतिक प्रकोप होते हैं, लोगों की अनचाही मृत्यु होती है, एक्सीडेंटल डैथ होती है तो आत्मायें भटक जाती हैं वहीं, क्योंकि उनका अपनी देह से बहुत मोह रहता है। वो सूक्ष्म रूप मेें रहती हैं। मोह में ऐसे अटके हुए होते हैं कि लम्बे काल के लिए वहीं भटक रहे होते हैं। इसीलिए हिन्दु धर्म में ये बहुत सुन्दर प्रथा रही कि अग्नि संस्कार कर दिया जाये। जब वो आत्मा सूक्ष्म शरीर में रहती हुई देखती है कि ये सब तो अब नष्ट हो गया तो वो फिर मन बना लेती है वहाँ से जाने का। अपने चित्त को वहाँ से मुक्त कर लेती है। और उसका पुनर्जन्म हो जाता है। और ये जो ऐसे केसेज होते हैं, बड़ी-बड़ी त्रासदियां होती हैं। देखो लाखों लोग मरे होंगे। गाँवों के गाँव नष्ट हो गए थे। तो ये सब आत्मायें भटक जाती हैं। मतलब इन्हें पुनर्जन्म नहीं मिलता। दु:खी होती रहती हैं। जैसे किसी का घर तोड़ दिया जाये और फिर उसे भटकने के लिए विवश कर दिया जाये तो उसका क्या हाल होता है। तो ये देह भी आत्मा का घर है अभी उससे ये छिन लिया गया है। आत्मायें भटक रही हैं एक नये घर की तलाश में। उनका मन बहुत अशांत है, बेचैन है। लेकिन उनको पुनर्जन्म तब तक नहीं मिल सकता जब तक उनका चित्त शांत न हो। तो अब जब बहुत-सी आत्मायें भटक रही हैं तो ये उन सबका परम कत्र्तव्य है जो राजयोग का अभ्यास कर रहे हैं कि इन सबको वायब्रेशन्स देकर मुक्ति का वरदान दें। जो श्रेष्ठ राजयोगी हैं उन्हें परम सद्गुरु से ये वरदान प्राप्त है कि वो दूसरी आत्माओं को मुक्ति का वरदान दे सकते हैं अर्थात् उन्हें पुनर्जन्म दिला सकते हैं। और ये होगा योग के वायब्रेशन्स के द्वारा। तो उन्हें सात दिन तक आधा घंटा योग के वायब्रेशन्स दें। और संकल्प करें कि इन आत्माओं का पुनर्जन्म हो जाये तो आपके वायब्रेशन्स से उनका चित्त शांत हो जायेगा। और उनको मुक्ति मिल जायेगी यानी पुनर्जन्म हो जायेगा। लेकिन कई धर्मों में ऐसा भी होता है कि देह को जलाया नहीं जाता,दफनाया जाता है तो इसमें भी यही होता है कि आत्मा जब तक देखती है कि उसका शरीर बिल्कुल ठीक है। क्योंकि शरीर तो मिट्टी का है। वो धीरे-धीरे तत्वों में मिलने लगता है। और जब शरीर का अस्तित्व मिट्टी में मिलकर समाप्त हो जाता है तो तब आत्मा सोचती है कि अब उसमें जाकर क्या करेंगे। तो आत्मा फिर पुनर्जन्म ले लेती है। देखिए असली चीज़ तो है मनुष्यों के पाप और पुण्यों की। जिस मनुष्य के पुण्य बहुत हैं उसके लिए कोई कुछ भी न करे तो भी उसकी गति श्रेष्ठ होती है। क्योंकि अगला जन्म कैसा होगा, कितना जल्दी होगा ये निर्भर करता है मनुष्य की अंतिम मनोस्थिति पर। मान लो एक व्यक्ति अपने परिवार को याद कर रहा है, उसे अपने किए गए कर्म याद आ रहे हैं, उसका चित्त कुछ विषय वासनाओं में लगा है। तो उस आत्मा का जल्दी पुनर्जन्म नहीं होता अगर होगा भी तो वो ऐसे गन्दे घरों में जहाँ इस तरह का ही वातावरण हो, वहीं पर हो जायेगा। और जिनके पुण्य कर्म बहुत हैं उनको वास्तव में ये कर्म-काण्डों की कोई ज़रूरत नहीं है लेकिन भारत में ये आम प्रथा कर दी गई थी कि घर में थोड़ी शांति हो, थोड़ा मंत्र जाप हो तो थोड़े अच्छे वायब्रेशन्स हों। लेकिन मृत्यु के बारे में सभी को जानना अति आवश्यक है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु जहाँ, जिस कारण से, या जिस साधन से और जिस समय होनी है वो पूर्व निश्चित है। उस मनुष्य के मन में विचार वैसे ही आयेंगे। उसी टाइम आयेंगे कि अब हमें चलना है। वो प्लान तब ही बनायेंगे कि इस समय हमें जाना है। क्योंकि जैसे उनकी मृत्यु उनका आहवान कर रही थी कि तुम्हें यहाँ आना है। इसलिए मृत्यु के इस सत्य को सबको स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसको टाला भी नहीं जा सकता है। इस तरह ये गति काम करती है तो कुछ आत्माओं के बहुत अच्छे पुण्य भी होते हैं। उनका बहुत जल्द पुर्नजन्म हो जाता है। इन सब चीज़ों के लिए स्वयं को मजबूत करना है। और जो होने जा रहा है उसके लिए भी स्वयं को तैयार करना है।

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