मन की बातें

प्रश्न- कई ऐसी दूसरी संस्थाएं भी हैं जहाँ कहते हैं कि हमारे यहाँ भगवान आते हैं और आपका भी यही कहना है। सत्य क्या है?

उत्तर- देखिए अगर भगवान आते हैं तो सत्य ज्ञान देंगे, सृष्टि के आदि-मध्य-अंत का ज्ञान देंगे। अब देख लें भगवान आते हैं तो वो केवल चमत्कार दिखाते हैं या फिर सम्पूर्ण ज्ञान दे रहे हैं। ये है पहली पहचान। दूसरा, जब भगवान आते हैं तो वो मनुष्य आत्माओं को पावन बनाते हैं। देख लें किसी को पावन बनने का संदेश दे रहे हैं। अगर वो पावन नहीं बना रहे हैं तो वे भगवान नहीं हैं। भगवान आते हैं तो आत्माओं की सद्गति कर देते हैं- ज्ञान देकर, राजयोग सीखाकर। अगर वो ऐसा कर रहे हैं तो ठीक है, अगर ऐसा नहीं कर रहे हैं तो भगवान नहीं। होता क्या है कि कुछ आत्माएं भी हैं जो बहुत अच्छी हैं, वो कहीं न कहीं आती हैं और लोग समझते हैं भगवान आ गए। भगवान ज्ञान का सागर है- ज्ञान देगा, प्यार का सागर है- अथाह प्यार देगा, पतित-पावन है- सबको पावन बनाएगा, सबको राजयोग सिखाएगा और मुक्ति व जीवनमुक्ति का मार्ग दिखाएगा, बहुत अपनापन देगा। वायबे्रशन्स में भी गहन शान्ति छा जाएगी क्योंकि वो शान्ति का सागर है। ये सब प्रूफ हैं भगवान के आने के।

प्रश्न- हमें कॉकरोच को मारना चाहिए या नहीं?

उत्तर- अगर वो गन्दगी कर रहे हैं, आपके भोजन बनाने व खाने की तरफ आ जाते हैं तो भगाने के भी साधन हैं लेकिन अगर मारना ही ज़रूरी है तो दवाई डाल देते हैं, तो मार भी सकते हैं। अब हमें मच्छरों को मारना चाहिए या नहीं? अब या तो मच्छर को हम मारें या वो हमें मार देंगे। धार्मिक और अधार्मिक दृष्टि से उनसे बचाव करना बहुत आवश्यक है। नहीं तो गन्दगी फैलती है, कई सारी बीमारियां फैलती हैं। अब भोजन में, सब्जियों में इधर-उधर घुस गए तो ठीक नहीं रहेगा। इसलिए प्रोटेक्शन के लिए ये करना ज़रूरी है। हम-आपका कोई इरादा थोड़े ही है कि हम कोई जीव हत्या करें। आत्म सुरक्षा के लिए, इस शरीर की सुरक्षा के लिए ये साधन अपनाया जा सकता है।

प्रश्न- मैं कुक हूँ और इन्डिया से बाहर काम करता हूँ। वैसे तो मैं पूरा शाकाहारी हूँ लेकिन प्याज-लहसून वाला खाना तो मुझे चेक करना पड़ता है। मैंने राजयोग इन्टरनेट द्वारा ज्वॉइन किया है, मैं कभी कोई सेन्टर पर नहीं गया हूँ, बाबा हमेशा मेरे साथ होते हैं ऐसा मुझे अहसास होता है लेकिन यहाँ पर मेरे मन में थोड़ी-सी दुविधा है।

उत्तर- नहीं। कोई ऐसी बात नहीं। खाना नहीं चाहिए। अगर उसको चेक ही करना है केवल तो उसमें कोई हर्जा नहीं। क्योंकि ये आपकी ड्यूटी है। इसमें कुछ भी ऐसा मर्यादाओं का उल्लघंन नहीं है। प्रश्न- एक घण्टे के मेडिटेशन में हमें क्या-क्या करना चाहिए? उत्तर- एक्चुअली योगाभ्यास में ये जाप आदि नहीं करना होता है। सीखते जायेंगे धीरे-धीरे, अभ्यास करें शिवबाबा से कनेक्ट होके उनकी किरणें रिसीव करें। चलते-फिरते योग करें। थोड़ा स्वमान का अभ्यास करें। उन्हें रिपीट नहीं करना है।108 बार कर लेना वो एक अलग विधि हम सिखाते हैं, योगाभ्यास में इसकी ज़रूरत नहीं होती है। पांच स्वरूपों का अभ्यास करें। तो नेट पर बहुत सारी क्लासेज़ हैं वो देख लेंगे और योग ऐसी चीज़ है जो अपने अनुभवों से धीरे-धीरे समझ में आता जाता है कि हमें क्या करना है। तो घण्टा आप न बैठें-10-10 मिनट 4-5 बार आप बैठ जाएं। अगर 4-5 मिनट बार-बार बैठना सम्भव नहीं है तो आधा-आधा घण्टा आप दो बार बैठें। मतलब ज्य़ादा समय बैठने से आपको ये समस्या होगी कि क्या करें। थोड़ा समय है तो शिवबाबा की किरणें लेना, कभी उनसे बातें करना, भिन्न-भिन्न अभ्यास हैं। कभी फरिश्ता स्वरूप का अभ्यास है। ये सब आपको नेट से मिल जाएगा। धीरे-धीरे प्रैक्टिस बढ़ाते जाना है।

प्रश्न – क्या हमें योग में स्नान करके ही बैठना चाहिए या बिना स्नान के भी हम योग, साधना, तपस्या कर सकते हैं?

उत्तर – किया तो बिना स्नान के भी जा सकता है। आँखों पर पानी डाल लें और ब्रश कर लें, थोड़ा फे्रेश होकर जा सकते हैं। लेकिन बहुतों के साथ ऐसा होता है कि स्नान कर लेंगे तो बहुत फ्रेश होंगे। उनके अन्दर विचार सुन्दर उठेंगे। उनको नींद जैसी फीलिंग नहीं होगी। हरेक को अपना-अपना देख लेना चाहिए। अब मेरी बात करूँ, मैं उठते ही आँखों पर पानी डालकर, फिर पानी चार्ज करके पीकर अपना प्रारम्भ कर देता हूँ। फिर मन फ्रेश हो जाता है और योग में आनंद आता है। लेकिन अगर किसी को ऐसा लगता है कि उन्हें शौच जाना ही है तो उसके बाद उन्हें स्नान कर लेना चाहिए। तो उनका चित्त और फ्रेश होगा। ये हरेक व्यक्ति की अलग-अलग स्थिति है। किसी को स्नान करने के बाद सुन्दर विचार उठने लगेंगे, मन आनंदित होगा। लेकिन किसी को बिना इसके ही चलेंगे सुन्दर विचार। तो जैसा जो उचित समझें, इसमें कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

प्रश्न : योग में बैठने में क्या विशेष आसन भी है? जब हम तपस्या की बात करते हैं तो कोई अर्धप्दमासन की स्थिति में दिखाया जाता है, या किसी और आसन की बात, या किसी मुद्रा विशेष में बैठते हैं तो क्या यहाँ मुद्रा आसन का भी कोई महत्त्व है?

उत्तर : नहीं, यहाँ पर इन चीज़ों का कोई महत्त्व नहीं है। मान लो किसी के घुटने ही दर्द हैं वो नीचे कैसे बैठें! वो कुर्सी पर बैठें या सोफा पर बैठें। किसी को और कोई तकलीफ है तो बड़े आराम से बैठें। यहाँ पर जो अभ्यास हैं कि मैं आत्मा अलग और ये देह अलग, अशरीरी होना और ऊपर सुप्रीम से कनेक्शन जोडऩा, उसकी आवश्यकता है। यानी एक स्थिति के आसन पर बैठना है। स्थूल आसन कैसा भी हो लेकिन योग खड़े होकर भी किया जा सकता है, बैठ कर भी किया जा सकता है, चेयर पर बैठकर भी किया जा सकता है। जैसे भी किसी को रिलेक्स हो। आजकल शरीरों की कइयों को तकलीफ है। किसी को पैरों की, किसी को घुटनों की, किसी को कमर की, किसी को सर्वाइकल हो गया है तो जैसे भी स्थित हों। इसलिए इसको कहा जाता है सुखासन। जिसमें सुख मिले, उस आसन में बैठकर योग करें। यहाँ तन की बात नहीं है, यहाँ मन की बात है कि मन को स्थिर करना है।

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