मुख पृष्ठलेखव्यवहार में तपस्या के मर्म को जानें

व्यवहार में तपस्या के मर्म को जानें

लेने की इच्छायें हमारे तपस्या के तेज को धुंधला कर देती है। अत: अच्छे साधक को इससे बचना चाहिए। अगर ऐसा कर पाये तो हमारे जीवन में आनंद और सन्तुष्टता समाहित हो जायेगी। तो तपस्या में हमें अपने को आनंदित करना है। आनंद प्राप्ति के लिए सूक्ष्म इच्छाओं का भी त्याग करना है।

कई माँ अपने बच्चों पर प्रेशर बहुत रखती हैं। इतने नम्बर लाने ही हैं। न बच्चे को टी.वी. देखने देती, न खेलने-कूदने देती। बस पढ़ो। चाय बना कर रख देती है रात में नींद आये तो चाहे चाय पी लेना। ऐसा कोई बुद्धिमान नहीं बना करता। हमारे घर में मेरी भतीजी है, उसकी माँ उसको डाटती थी- टी.वी. देखती है, पढ़ती नहीं है। लेकिन जब रिज़ल्ट आया तो उसने गोल्ड मेडल लिया था। बुद्धिमानों को रात-दिन पढऩे की ज़रूरत नहीं होती इसलिए माताएँ अपने बच्चों को उसकी बुद्धि का विकास करने के लिए उनपर दबाव न डालें, उन्हें खुला माहौल दें। घर में खुशी का माहौल बनायें।
अगर आपके घर में क्रोध है और सदा ही तनाव रहता है। वहाँ अपनेपन का निर्माण करेंगे। हमें उम्मीदें दूसरों से बहुत ज्य़ादा रहती हैं। सम्बन्धों में आप चेक कर लें। हर व्यक्ति दूसरों से कुछ न कुछ डिमान्ड(मांग) कर रहा है। ये व्यक्ति मुझे सम्मान दे, ये व्यक्ति मेरी बात सुने, ये व्यक्ति मुझे आगे बढ़ाये। लेकिन आप ये सोच लें जिसे आप सम्मान मान रहे हैं उनका अपना स्वमान तो पहले ही समाप्त हो चुका है। जिनसे आप प्यार माँग रहे हैं उनके मटके पहले ही सुखे हुए हैं।
लेकिन ये ध्यान रखें कि जो दोगे तुम्हारे पास डबल होकर वापस आयेगा। सुख दो डबल होके तुम्हारे पास आयेगा। दूसरों को प्यार बाँटो तुम प्यार के भण्डार बन जाओगे। तुम्हें प्यार की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। सम्मान दो, सम्मान पाओगे। सहयोग दो 10 गुणा सहयोग प्राप्त होगा। लेकिन आजकल के समय में लोगों में सम्मान कम होता जाता है, और सहयोग की भावना तो बहुत कम हो गयी है। मैं सभी से कहूँगा अपने बुज़ुर्गों का बहुत सम्मान करें सभी। पसंद है? पसंद है? एक छोटी-सी कहानी हमारे यहाँ के अखबार में छपी। एक व्यक्ति अपने माँ-बाप से अच्छा व्यवहार नहीं करता था। दोनों बुज़ुर्ग हो गये थे। उनको एक अलग कमरा तो दिया हुआ था। मिट्टी के बर्तन रखे हुए थे, मिट्टी के बर्तनों में भोजन रख आते थे। ये सब इनका छोटा बच्चा देखता था। अचानक दोनों की मृत्यु हुई। दोनों की चिताएं जली। ये मिट्टी के बर्तन भी उनकी चिता के पास रख दिये। क्या होता है कि चिता को जैसे आग लगाई तो बच्चा दौड़ा और मिट्टी के बर्तन उठाकर ले आया तब उसके पिता ने उसको बहुत डाँटा कि ये क्या कर रहे हो? क्यों ला रहे हो? उसने चुपचाप थोड़ी आवाज़ से उत्तर दिया, ये आपके काम आयेंगे। जैसा व्यवहार हम दूसरों से करते हैं वैसा ही हमें प्राप्त होता है। यही सृष्टि और कर्मों का सिद्धान्त है। होता है कि नहीं ऐसा! ये अटल सिद्धान्त है कर्म का। इसको कोई टाल नहीं सकता, काट नहीं सकता। लेकिन ऐसा भी होता है कि कई बुज़ुर्ग लोग ज्य़ादा गुस्सा करने लगते हैं। चिड़-चिड़ करतेे हैं, शांति नहीं रखते। कुछ बीमारीयां हो जाती हैं जिससे बच्चों को परेशानी होनी लगती है। कई बच्चे हमने देखे। अपने माँ-बाप को आँखों पर रखते हैं बुजुर्ग की स्थिति में भी। तो हम भारत की इस सुन्दर परम्परा की शुरूआत रखें।
पश्चिमी दुनिया में ये परम्परा नहीं है। पर हमारे भारत की सभ्यता की ये सुन्दरता है कि बच्चे यहाँ अपने माँ-बाप का सम्मान करते हैं। हम उनका आशीर्वाद भी लें। सम्मान केवल पैर छूने से नहीं हो जाता है लेकिन सम्मान एक दिल की भावना है। सभी अपने बुज़ुर्गों से परेशान नहीं होंगे। बहनें जो योग करती हैं वो अपने बच्चों को सम्भालें, योग करें या सास-ससुर की सम्भाल करें। उनके लिए भी कठिनाई होती है। लेकिन फिर भी अगर हमारी भावनाएं श्रेष्ठ होंगी तो हम ये करने में सक्षम हो जायेंगे। श्रीमद्भगवत गीता तो सारी निष्काम भाव पर लिखी गई है। आधी गीता में निष्काम कर्मयोग, निष्काम भाव का वर्णन है। आज लोग उसे भूल गये। केवल गीता का थोड़ा पाठ करते, आजकल तो वो भी नहीं रहा। लेकिन जो उसके मूल सिद्धान्तों पर ध्यान देते हैं कि हमें निष्काम भाव धारण करना है। आज कल की जो भाषा नो एक्सपेक्टेशन्स, यह इंग्लिश का शब्द है। श्रीमद्भगवत गीता पर बहुत विस्तार से कहा गया है कि अच्छा कर्म करो तो फल तुमको अच्छा मिलेगा ही लेकिन किसी की सेवा करो, किसी की मदद करो। मदद करो और भूल जाओ। रिटर्न में हमें कुछ मिलना चाहिए इसकी कामना न करें हम।
मैं बचपन से गीता का अध्ययन करता था। मुझे एक बात उसमें समझ नहीं आती थी। हे अर्जुन जब मनुष्य ये सोचता है कि ये-ये अच्छा काम करूँगा, ये-ये करूँगा, मैं दान करूँगा, मैं इतनों की सेवा करूँगा। ये भी रजो प्रधान कर्म है। मैं सोचता था इतने अच्छे-अच्छे कार्य, यज्ञ करूँगा, तप करूँगा, सेवा करूँगा, दान-पुण्य करूँगा- अगर ये कार्य तमोप्रधान कर्म है तो सतोप्रधान कर्म कौन-सा है..! मैं जब छोटा था तो सोचता था ऐसा। उत्तर तो मिलता नहीं था। जब यहाँ आये तो यहाँ उसकी सुन्दर व्याख्या प्राप्त हो गई। क्योंकि उसके पीछे ये भाव है कि मैं करूँगा। ठीक बात है ना! सूक्ष्म भाव है कि मैंने किया और मैं करूँगा। चाहे किसी तपस्वी को यही हो मैंने बहुत तप किया, ये भी मैं पन है। जो उसकी तपस्या के दिव्यता को लोप कर देता है। इसलिए हम सब श्रेष्ठ कर्म, कामनाओं से रहित होकर करें। ये नहीं कि हमने कोई अच्छा कार्य और ये भी संकल्प कर लिया कि लोगों को पता तो चले मैंने ये काम किया है। अगर कर्म करके उसके बदले में जो हमारा भाव कुछ पाने का है तो ये अच्छे साधक की निशानी नहीं है। हमें इनसे ऊपर उठकर आगे बढऩा है। यही तपस्या फलीभूत होगी। और आपके अंतर्मन में खुशी और सन्तुष्टता दिलायेगी।

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