मुख पृष्ठदादी जीदादी प्रकाशमणि जीवृत्तियों को कन्ट्रोल करना ही तपस्या है

वृत्तियों को कन्ट्रोल करना ही तपस्या है

जितना तपस्वी बनो उतना धन्य बनेंगे, कर्मेन्द्रियों को वश करना ही तपस्या है। वृत्तियों को कन्ट्रोल करना ही तपस्या है

ईश्वरीय मर्यादा हमारे जीवन का ऑर्डर है। बाकी कोई ऑर्डर नहीं। इसमें जितना अपनी रूहानियत में मस्त रहो, मेरा एक बाबा- उसी मस्ती में रहो, यह कंगन बहुत स्ट्रिक बंधा हुआ होना चाहिए। मैं जब यह बात बोलती तो समझते यह मार्ग तो बड़ा कठिन है। फिर बुद्धि जाती गन्धर्वी विवाह में। लेकिन जिन्होंने किया वह अभी आंसू बहा रहे हैं। रो रहे हैं। इसलिए कभी भी यह संकल्प नहीं आवे। ऐसे नहीं कम्पेनियन चाहिए। मरना तो पूरा मरना। जीने का नहीं सोचो। हमें बाबा की गोदी में जीना है। दुनिया से हम मर गये। खाने का, पहनने का, नींद का सब ऐश चला गया। हम सब त्याग चुके। त्याग माना त्याग। जिसने नींद का त्याग किया, उसने सब त्यागा। 3:30 बजे मीठी नींद आती। बाबा कहता उठ। वह भी बाबा ने छीन लिया, बाकी क्या चाहिए। इसलिए हमेशा बाबा कहता बेहद के वैरागी बनो। जितना वैरागी उतना योगी रहते।
सेवा तो आप लोग कर ही रहे हो। जो कुछ भी है उसे सफल करते चलो। कल का क्या पता। जितना बुद्धि में सेवा है, उनका ही महान भाग्य है। परन्तु सेवा के जोश के साथ-साथ होश भी चाहिए।
लौकिक को भी थोड़ा चलाना, करना ठीक रहता। नहीं तो सर्विस में डिससर्विस हो जाती। जितना सर्विस में बुद्धि लगी रहे उतना अच्छा है, आर्टिकल लिखो, डायलॉग लिखो, अनुभव लिखो, आर्टिस्ट बनो। किसी न किसी कार्य में बुद्धि लगी रहे। सब आर्ट सीखो, वक्त पर सब काम आता है।
अगर सेवा में फोर्स है तो कुमारों के कारण, कुमार अपना तन भी लगाते, मन भी लगाते, धन भी लगाते। सभी सेन्टर्स की यह रिज़ल्ट है। आप कुमार सब चिन्ताओं से मुक्त हो। कुमार-कुमारी माना संगम के जीवनमुक्त। कोई बन्धन नहीं। वृत्ति में मेरा बाबा, वायुमण्डल में वायब्रेशन है सब बाबा के बनें, कल्याण की भावना है। जीवन है बाबा की सेवा में। हम-आप दुनिया के वायुमण्डल, वायब्रेशन से मुक्त हैं। हम दुनिया को बाबा के वायुमण्डल में बांधते हैं।
आप सब 100 प्रतिशत लकी हो। आप सबको सर्विस के लिए बाबा ने अपनी भुजायें बनाया है। आप सब समर्पण हो। अगर आप धन से सेवा नहीं करते तो सर्विस नहीं बढ़ती। आप यह नहीं सोचो हमें बाबा ने नौकरी का बन्धन दिया। आप धन से सहयोग न दो तो सेन्टर कैसे चले! आपका पूरा तन-मन-धन बाबा के प्रति है। आप 100 कमाओ उसमें 25 माँ-बाप को, 25 अपने लिए तो 50 बाबा के कार्य में लगाओ। यही सोचो मैं बाबा के कार्य के लिए 5 टका कमाने गया हूँ। दुनिया ही गन्दी है। गन्दों के बीच हमें अपनी रूहानियत में रहना है क्योंकि बाबा के लिए कमा रहा हूँ। लौकिक माँ-बाप ने पाला है उनको भी सहयोग देना मेरा फजऱ् है। धन को परसेन्टेज से ज़रूर बाँटो।
जो कुमार अपने हाथ से पकाकर खाते हैं, मैं उन्हों को अपने से भी बड़ा मानती हूँ। आप धन्य हो। अगर सूखी रोटी खाकर चलते, तो बाबा आपको मदद देगा। आप दो रोटी खाओ बाबा की मस्ती में रहो। ऐसे नहीं सोचो रोज़-रोज़ ऐसे कैसे होगा। अरे रोज़ संगम थोड़े ही आयेगा। जितना तपस्वी बनो उतना धन्य बनेंगे, कर्मेन्द्रियों को वश करना ही तपस्या है। वृत्तियों को कन्ट्रोल करना ही तपस्या है। अतीन्द्रिय सुख के रस में रहो, रोटी तो घोड़े को घास है, इसका रस नहीं।

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