Homeब्र.कु. अनुजमन में उठने वाले उद्वेगों की शांति-सच्ची क्रांति

मन में उठने वाले उद्वेगों की शांति-सच्ची क्रांति

इस दुनिया में सभी ने स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जा करके गणित, भूगोल, समाज शास्त्र, इतिहास का ज्ञान लिया, सूचनाएं ली, उसके द्वारा परीक्षा भी दी और उत्तीर्ण भी हुए। प्राप्तांक भी प्राप्त किया। लेकिन मन में उठने वाले उद्वेगों को शांत करने का ज्ञान सभी के पास नहीं है।
आज सभी बहुत सारी सुविधाएं, बहुत सारी चीज़ें करते हैं। जिसमें वो अपने आपको फ्री महसूस करते हैं, या कहें स्वतंत्र महसूस करते हैं। स्वतंत्रता उनके जीवन में एक नया आयाम लेकर आई है। लेकिन जब वो रात में सोने जाते हैं या कभी अकेले बैठते हैं तो उस समय उनके मन में केवल एक प्रश्न उठता है कि व्यर्थ क्यों चल रहा है? नकारात्मक क्यों चल रहा है? इसलिए कहावत है जो कल में जीता है वो हमेशा विकल रहता है, माना व्याकुल रहता है। और जो दिन-रात परसों करता रहता है, तो उसके जीवन में हर चीज़ बरसों तक आने की मार्जिन कम हो जाती है। और जो आज में जीता है वही राज करता है। लेकिन आज तो स्वतंत्रता का मेन हमारा मुद्दा है।
आज हमारा है, माना हम परतंत्र हैं। लेकिन अगर मैं कल और परसों में जीवन को जी रहा हूँ तो मैं परतंत्र हूँ। इसलिए परतंत्रता की परिभाषा बदल गई। पहले था कि हम किसी के दास थे, गुलाम थे, आज हम अपने मन-बुद्धि और संस्कारों के दास और गुलाम हैं। माना व्यर्थ संकल्पों के या नकारात्मक संकल्पों के गुलाम हैं। यह गुलामी बहुत ही भयावह स्थिति पैदा करती है। कहने का मतलब ये है कि हम ये बातें किसी से कह थोड़े सकते हैं।
हम थोड़ा बाहर घूम आते हैं, किसी से मिल आते हैं, थोड़ी देर के लिए उस पर लेप लगा देते हैं और लगता है कि हमने आज के जीवन को आज जिया है लेकिन वो वहाँ भी बैठे-बैठे कल और परसों के विचार आते रहते हैं।
तो स्वतंत्रता की जो परिभाषा है आज वो थोड़ी-सी अलग है। हमारे जो भी शरीर के साथ जुड़ी हुई चीज़ें हैं, जिनके लिए हम उतावले रहते हैं, इंतज़ाम करते हैं, चारों तरफ घूमते हैं, उसको खुश रखने की कोशिश करते हैं और उसी से सम्बन्धित विचार हमारे मन में भी आते हैं। तो विचार आने का मात्र एक भाव है और वो भाव है कि हमारा या तो व्यर्थ है या तो नकारात्मक है। तो परमात्मा ने हमारे जीवन में स्वतंत्रता को बढ़ाने का एक बहुत सहज और सरल तरीका बताया कि जो बीत गया उसको बिन्दी लगाओ और जो आने वाला है उसका बहुत प्यार से स्वागत करो। और जो चल रहा है उसको खुशी-खुशी जियो।
तो स्वतंत्रता दिवस पर क्या हम एक दिवस नहीं मना सकते? हमको खुशी, शांति, प्रेम का एक दिवस उसके साथ जोड़ देना है, जो हमारे वर्तमान को तय करे, आज को तय करे, भविष्य को शक्तिशाली बनाए। और वर्तमान अगर हमारा आज तय हो गया तो भविष्य तो अच्छा होना ही है। इसीलिए हम सभी मिलकर इन विकारों पर अगर एक साथ विजय प्राप्त करें तो हम रावण रूपी विकारों पर अवश्य विजय प्राप्त कर लेंगे। क्योंकि दुनिया में कोई किसी को परेशान नहीं कर रहा है। उसके संस्कार ही उसको तंग कर रहे हैं। और जो संस्कार हमने बनाए हैं उन संस्कारों की वजह से हमारे जीवन में इतनी सारी कड़वाहट आई है। और वो कड़वाहट हमें परेशान कर रही है।
तो चलो उठते हैं, आगे की तरफ चलते हैं, और नये स्वतंत्रता दिवस को नये तरीके से अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं।

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