साधन होते भी साधनों में रग न जाये – राजयोगिनी ब्र.कु.जयंती दीदी,अतिरिक्त मुख्य प्रशासिका,ब्रह्माकुमारीज़

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अपनी मन की वृत्ति बिल्कुल साफ है, बिल्कुल बाबा की भावना है, बाबा के प्रति ये संकल्प है कि जो बाबा हमसे सेवा कराये तो वो सेवा अपने आप ही होती रहती।

जैसा कि पिछले अंक में आपने पढ़ा कि 40 वर्ष मैं दादी के पास एक ही कमरे में रही। तो दादी की कई बातें कदम-कदम पर याद आती ही रहती हैं। दादी ने कहा था कि मैं अपना हिसाब रखती हूँ सवेरे से रात्रि तक, मैं कितना लेती हूँ अपने तन के लिए, अपने मन के लिए और मैं कितना बाबा को सेवा में रिटर्न देती हूँ। मैं बिल्कुल ये हिसाब रखती हूँ कि लिया कितना स्थूल हिसाब से और मैंने दिया कितना सेवा के हिसाब से। अब आगे पढ़ते हैं…
गरीब ते गरीब भी कोई इतना हिसाब नहीं रखता कि मैंने लिया कितना और किया कितना। परंतु बाबा के बच्चे इतनी ऊंची स्थिति वाले भी ये ध्यान रखते। तो उस हिसाब से आप सोचो बाबा से जो सूक्ष्म लेते हैं उसकी तो कोई गिनती ही नहीं है। परंतु स्थूल में भी हम बाबा से लेते क्या हैं और रिटर्न में देते क्या हैं। तो जब ये हमारा इतना वैराग्य होगा कि हमें इस संसार से कुछ भी नहीं चाहिए। हाँ, बाबा प्रकृति दासी भी करता, परंतु उसमें भी मुझे कहाँ तक स्वीकार करना है ये मुझे अपना हिसाब रखना है। दादी के पास कितने लोगों ने आकर बढिय़ा गाड़ी की चाबी दी होगी जब बहुत ज्य़ादा भण्डारे में भी नहीं था, सिम्पल लाइफ थी। लंडन में तो एक भाई ने बहुत बढिय़ा गाड़ी की चाबी आकर दादी को दी। दादी ने वो चाबी उनको वापस की, क्यों? दादी ने कहा कि मैं ये स्वीकार नहीं कर सकती हूँ। क्योंकि बाबा कहते हैं कि साधारण रीति से अपने जीवन को व्यतीत करो। न कि कोई ऐसी जीवन हो जिसमें औरों का ध्यान चला जाये कि योगी लोग क्या कर रहेे हैं? तो उस भाई ने फिर कहा कि अच्छा सेवा के लिए अभी काम की चीज़ क्या हो सकती? तो दादी ने कहा कि मैं कहाँ भी क्लास के लिए जाती हूँ, भाषण के लिए बड़ा परिवार है तो आठ-दस लोग तो कह देते कि हमको दादी के साथ चलना है, परिवार इतना बड़ा तो नहीं था उस समय, तो आप ऐसी गाड़ी लेकर आओ जिसमें आठ-सात लोग बैठ सकें। ताकि उन्हों की सेवा हो सके। और वो बाबा के नज़दीक आ सकें। तो भाई आज्ञाकारी था तो वही काम किया और वो गाड़ी वापस करके वो गाड़ी लेकर आया जिससे सेवा हो सके।
तो जब मन में अपने लिए बिल्कुल कुछ संकल्प नहीं है कि ये मुझे चाहिए तो फिर हम देखते हैं कि सेवा के लिए भी प्रकृति दासी बनती। परंतु सेवा के लिए भी ये संकल्प न हो कि इस चीज़ के बिना सेवा नहीं हो सकती। शुरूआत में जब वारिस आत्मायें निकले, जब दादियां चौदह साल की भट्टी करके संसार में वापिस लौटी तो उस समय दादियों के पास न कोई पुस्तक थी हाथ में और न कोई टोली। कुछ भी नहीं था। सेवा कैसे हुई? उन्हों की दृष्टि के द्वारा, उन्हों के मुख द्वारा जो बाबा ज्ञान सुनाते थे वो ज्ञान सुनाते रहे तो मुख द्वारा, दृष्टि द्वारा, संकल्प द्वारा वारिस आत्मायें पैदा हुईं। जिन्होंने फिर सेवा की रिस्पॉन्सिबिलिटी उठाई सारे भारत में तो क्या सारे विदेश में भी। तो सेवा के लिए कुछ चीज़ नहीं चाहिए। सेवा के लिए चाहिए साफ दिल और मन की वृत्ति।
मन की वृत्ति में ये है कि जो बाबा ने हमें दिया है वो हमें औरों को देना है। तो फिर उस वृत्ति के आधार से वो वातावरण भी बनता और फिर उस वातावरण से जो भी आत्मायें आती वो नज़दीक आती। विदेश की सेवा शुरू कहाँ से होती? दो छोटे कमरे। और छोटे कमरे तो थे लेकिन उनकी दीवारों में गीलापन था। तो वैसे तो दादी की तबियत ऐसी थी कि लंग्स का सदा ही दादी को प्रॉब्लम रहता था बचपन से ही। तो दादी ने ये नहीं सोचा कभी कि ये स्थान मेरे लिए योग्य नहीं है। ये स्थान मेरी तबियत को बिगाड़ेगा,नहीं। बाबा का स्थान है बस यही संकल्प।
उस छोटे से स्थान पर इतनी तपस्या रही कि विश्व की जो मुख्य देश, सारे विदेश की सेवा सम्भालने वाले आज हैं कई आत्मायें उस छोटे से स्थान से जन्म लिया, पालना ली और बड़े होकर उन्होंने भिन्न-भिन्न देशों में जाकर सेवायें की। तो ये जो मैं आपको बातें बता रही हूँ ये प्रैक्टिकल हमारे अनुभवों की हैं। ये थ्योरी की बातें नहीं हैं। अपनी मन की वृत्ति बिल्कुल साफ है, बिल्कुल बाबा की भावना है, बाबा के प्रति ये संकल्प है कि जो बाबा हमसे सेवा कराये तो वो सेवा अपने आप ही होती रहती। और जो भी साधन की ज़रूरत होती वो भी हमें प्राप्त होता रहता। तो कहाँ पर भी हमारी रग न जाये।

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