मुख पृष्ठब्र.कु. शिवानीखुद से खुद का रिश्ता जोड़ें…

खुद से खुद का रिश्ता जोड़ें…

जब बाहर की दुनिया की बात आती है तो हमें सबकुछ पता रहता है। सिर्फ अपने मन में क्या चल रहा है, यही हमें नहीं पता होता है। हम एक बटन से सबकुछ कंट्रोल कर सकते हैं, लेकिन कितना भी कोशिश करो मन को चुप नहीं करा पाते हैं। ऐसा क्यों हुआ कि बाहर सबकुछ हमारे कंट्रोल में है और जो अपना है वो ही अपने कंट्रोल में नहीं है?

दो प्रकार के शोर होते हैं। एक शोर होता है बाहर और दूसरा शोर होता है हमारे अंदर। जब बाहर शोर होता है तो इन कानों से कुछ सुनाई नहीं देता। जब अंदर शोर होता है तो सुनाई देता है लेकिन समझ नहीं आता। बाहर का शोर हमारे हाथ में नहीं है लेकिन अंदर मन की स्थिति कैसी रहे, यह पूरी तरह हमारे हाथ में है। हम एक ऐसे युग से गुज़र रहे हैं, जहाँ लोगों को लगता है कि मन को कंट्रोल करना तो असंभव है। क्योंकि हमने अपने मन का कंट्रोल औरों को दिया हुआ है।

आज के दिन को चेक करें। चाहे थोड़ा-थोड़ा सा इरिटेट हुए, कुछ बुरा लगा, थोड़ी-सी चिंता हुई, नाराज़गी आई, थोड़ा-भी मन हिला, हलचल में आया तो उस क्षण मैंने उस हलचल का जि़म्मेदार किसको ठहराया? मैं डिस्टर्ब हुआ किसकी वजह से? हमारी अंगुली किसकी ओर मुड़ती है? मेरा मन शांत हो जाए, स्थिर हो जाए, उसके लिए भी हम अंगुली दूसरों पर रखते हैं कि आप बदलो तो मैं ठीक हो पाऊंगा। क्योंकि बहुत समय से हम इसी तरह से चल रहे हैं, तो मन शांत होने के बजाए शोर बढ़ता जा रहा है। शोर मतलब मन ज्य़ादा सोचता है। सोचना बंद ही नहीं करता है। मन जब ज्य़ादा सोचता है तो थक जाता है। उसका असर शरीर पर भी पड़ता है। आज किसको कहा जाएगा कि वो भाग्यशाली है? जिसका तन, मन, सम्बन्ध और धन सही हो। जीवन जीने के लिए तो चार ही चीज़ें चाहिए, लेकिन उस सब की शुरुआत मन से होती है। सबसे ज़रूरी चीज़ आज पक्की करते हैं जीवन भर के लिए कि जब कोई दूसरे शहर से आता है तो आते ही वायबे्रशन में वो चेंज पता चलता है। वो सात्विकता, वो सादगी, वो प्यार, वो अपनापन, वो सिर्फ मन में नहीं रहता, वो फैल जाता है वातावरण के अंदर। क्योंकि संकल्प से सृष्टि बनती है।

जैसे हम विद्या अर्थात् पढ़ाई को कहते हैं तो पढ़ाई किस चीज़ की? आज दुनिया ज्य़ादातर फोकस करती है बाहर की दुनिया की पढ़ाई पर। जब बाहर की दुनिया की बात आती है तो हमें सबकुछ पता रहता है। सिर्फ अपने मन में क्या चल रहा है, यही हमें नहीं पता होता है। हम एक बटन से सबकुछ कंट्रोल कर सकते हैं, लेकिन कितना भी कोशिश करो मन को चुप नहीं करा पाते हैं। ऐसा क्यों हुआ कि बाहर सबकुछ हमारे कंट्रोल में है और जो अपना है वो ही अपने कंट्रोल में नहीं है? उसका कारण सिर्फ एक है कि बाहर मेहनत की तो सबकुछ पा लिया, थोड़ा-सा मन पर परिश्रम करेंगे तो यहां भी पा लेंगे। ज्य़ादा आसान क्या है- बाहर की दुनिया की संभाल या अपने मन की?

अगर आप अपने मन को कहें कि ऐसा नहीं सोचना तो क्या वो आपका कहना मानता है? हमें ऐसा मन चाहिए, जो हमेशा हमारी बात माने। आप देखो दूसरों का मन तो हमारी बात मानता है। आप किसी को कहें ऐसा करो तो वो तुरंत कर देते हैं। तो कौन सुन रहा है? उनका मन सुन रहा है। उनका मन मान रहा है। हमें कोई कुछ कहे तो भी हम मान लेते हैं। मतलब हम दूसरों का कहना मानते हैं, दूसरे हमारा कहना मानते हैं, सिर्फ हम खुद, खुद का कहना नहीं मानते। क्योंकि खुद के साथ तो कभी बैठकर समय बिताया ही नहीं, रिश्ता बनाया ही नहीं, तो वो रिश्ता निभाएगा क्यों? मेरे मन का रिमोट कंट्रोल दूसरों के पास होगा तो मैं खुद अपने को कैसे शांत कर सकूंगा?

ब्र.कु. शिवानी बहन,जीवन प्रबंधन विशेषज्ञा

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