मुख पृष्ठओम शांति मीडियायह संकल्प आपका भाग्य बदल देगा…

यह संकल्प आपका भाग्य बदल देगा…

हम समझते हैं कि ”मैं आत्मा मूल रूप से परफेक्ट हूँ- मेरे अंदर शांति, प्रेम, शक्ति और पवित्रता के गुण पहले से मौजूद हैं।” बाहरी दुनिया भले ही इम्परफेक्ट हो, पर मेरी भीतरी परफेक्शन ही मेरा असली भाग्य तय करती है। इस सत्य को उदाहरण के साथ समझते हैं…

  • 1. पहला उदाहरण – बाहर धूल हो सकती है पर हीरा हमेशा चमकता है। हीरा चाहे कीचड़ में गिर जाए, उसका मूल्य नहीं घटता। ठीक उसी प्रकार, बाहरी परिस्थितियाँ कितनी भी चुनौतिपूर्ण क्यों न हों, आत्मा अपनी परफेक्शन नहीं बदलती। अगर मैं अपनी कीमत और शक्ति याद रखूँ, तो परिस्थितियाँ मुझे नहीं गिरा सकतीं।
  • 2. दूसरा उदाहरण – मौसम बदलता है पर सूर्य की रोशनी नहीं। बाहर बादल हो सकते हैं, पर सूरज अपनी रोशनी नहीं खोता। इसी प्रकार, लोग कैसा व्यवहार कर रहे हैं, यह उनका मौसम है। मेरी शांति, मेरा एटीट्यूड – यह मेरी सूर्य रोशनी है।
  • 3. तीसरा उदाहरण – रेडियो पर क्या चल रहा है, यह आपके हाथ में नहीं; पर आपकी फ्रीक्वेंसी आपके हाथ में है। दुनिया में नकारात्मकता, गलत बातें, तनाव – यह सब ”बाहरी चैनल” हैं। लेकिन मेरा भाग्य इस बात पर नहीं बनता कि बाहर क्या बज रहा है बल्कि इस पर बनता है कि मैं किस फ्रीक्वेंसी पर ट्यून हूँ। अगर मैं खुद को बार-बार याद दिलाऊं, ”मैं ठीक हूँ… मैं शुद्ध आत्मा हूँ… मैं शांत हूँ… मैं शक्तिशाली हूँ” तो मेरी फ्रीक्वेंसी दिव्य बनी रहती है और वही फ्रीक्वेंसी मेरे जीवन का श्रेष्ठ भाग्य रचती है।
  • 4. चौथा उदाहरण – पौधे को पानी सही मिले तो वातावरण कितना भी कठोर हो, वह बढ़ता है। हमारी आत्मा भी एक पौधे की तरह है।

अगर मैं सही संकल्प, सही एटीट्यूड और सही स्पंदन(प्रकम्पन) से उसे सोचूँ, तो रिश्तों में, कार्य में, जीवन में – हर जगह वृद्धि होगी। बाहरी दुनिया कठोर हो सकती है, लेकिन मेरा भीतरी पोषण मजबूत है तो मेरा भाग्य स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ बनेगा।

मेरा भाग्य लोग नहीं लिखते, परिस्थितियाँ नहीं लिखतीं, समय नहीं लिखता। मेरा भाग्य मैं अपने संकल्पों से लिखता हूँ। ”मैं आत्मा परफेक्ट हूँ, मेरा एटीट्यूड परफेक्ट है, इसलिए मेरा भाग्य भी परफेक्ट बनेगा।”

अमृतवेला हो मासूम बच्चे की तरह…!

अपने को शक्तिशाली बनाने के लिए सबसे उत्तम समय ब्रह्ममुहूर्त है। जिस समय हमारे अति प्यारे परमपिता परमात्मा स्वयं हमें सर्वशक्तियों से श्रृंगारित करते हैं। ऐसे संगम के श्रेष्ठ समय के मध्य अपने को सर्वशक्तियों से भरने से वंचित न करें। इस समय का लाभ लेने के लिए न सिर्फ सोने के पहले का आधा घंटा बहुत ही महत्वपूर्ण है बल्कि अमृतवेले परमात्मा से श्रेष्ठ मिलन मनाने की नींव है। हमें बहुत ही ध्यान रखना है कि ऐसे समय को आलस व अलबेलेपन के कारण यूं ही गंवाना नहीं है। अगर इसे गंवाया तो ये ऐसा हुआ जैसे कि मुँह में से निवाला छीन लेना। अमृतवेले पारलौकिक परमपिता परमात्मा शिव बाबा अपने बच्चों पर सर्वस्व लुटाते हैं जिसमें वरदानों से भी भरपूर करते हैं। ये तभी सम्भव हो सकता है जब हमारी बुद्धि की लाइन क्लीयर होगी। जैसे कि एक छोटे बच्चे की होती है।

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