मुख पृष्ठदादी जीदादी जानकी जीज्ञान को ध्यान से सुनकर कर्म और सम्बन्ध में यूज़ करो तो...

ज्ञान को ध्यान से सुनकर कर्म और सम्बन्ध में यूज़ करो तो योग सहज हो जाएगा

सदा हर्षित रहने में देह का अभिमान विघ्न रूप बनता है। अपमान की फीलिंग आ जाती है। तो ऐसे देह अभिमान को निकालने के लिए बाबा ने ध्यान खिंचवाया कि सर्वशक्तियों को यूज़ करो उसमें भी खास परिवर्तन शक्ति। अपना अनुभव, विवेक कहता है कि अन्दर की लगन हो कि मुझे परिवर्तन होना है। कभी भी यह लगन ठण्डी न हो। ऐसे नहीं इसमें चेंज आनी चाहिए, यह परिवर्तन हो इस ख्याल के बजाए मुझे चेंज होना है। स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन होगा। जब विश्व परिवर्तन होगा तो क्या हमारे अन्दर परिवर्तन नहीं आएगा? यह अन्दर विश्वास हो, यह शब्द कोई घड़ी न भूले।

अपने आइने में देखते तो दिल गवाही देता है कि परिवर्तन से हम बाबा के सामने या सेवा में अनेक आत्माओं के सामने आ सकते हैं। नहीं तो मन खाता है कि मेरे में परिवर्तन नहीं है। परिवर्तन होता जाता तो अपने में विश्वास बढ़ता जाता। परिवर्तन होता जाता तो फील करते कि हमारे में सहन शक्ति, समाने की शक्ति है। परिवर्तन न होने का कारण है – सहन शक्ति की कमी। सिर्फ समा लो तो सहन करने की भी आवश्यकता नहीं है। समाने की शक्ति अनेक बातों में गम्भीर, सयाना बना देती है। मुख से यह नहीं निकलेगा कि हम सहन करते हैं या मेरे में सहनशीलता की कमी है। सहनशीलता की कमी क्यों है? समाने की शक्ति नहीं है। तो एक-एक शक्ति बाबा ने वर्से में दी है है- एक-एक शक्ति कमाल का परिवर्तन कर सकती है। ज्ञान को इतना यूज़ करो जो सुनते-सुनाते हमारे जीवन में आ जाए। कथनी करनी समान हो जाए, बोल और कर्म में कोई अन्तर दिखाई न पड़े। कर्म व जीवन में आया हुआ है तो चेहरा बता देगा, बोल भले कम बोलें। अभ्यास करके देखेंगे तो दिन-प्रतिदिन हमारे बोल कम होते जाएंगे। बहुत बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। लोगों को दुनिया में ऐसे हर्षित चेहरे दिखाई नहीं देते। उदास, मूँझे हुए चेहरे, रीयल दु:ख से भरे हुए चेहरे हैं। हमारे रीयल सुख से भरे हुए चेहरे हैं। रीयल सुख, शान्ति, प्रेम और आनंद भरा हुआ है – कोई खोलकर देखे। यह सब ज्ञान की शक्ति के आधार से भरा है।

जब परिक्षाएं आती हैं तो कहते हैं कि अगर ज्ञान न होता तो पता नहीं मेरी क्या हालत होती। ज्ञान अन्दर से अशान्ति को खत्म करता है। ज्ञान, योग को भी सहज कर देता है। ज्ञान को अगर अच्छी तरह से समझकर जीवन में लायें तो योग कोई कठिन नहीं है। जैसे मैं संगमयुग पर बाबा के सामने बैठी हुई आत्मा ब्रह्माकुमार-कुमारी हूँ। बाबा कहते तुम सर्वोत्तम ब्राह्मण हो। सर्वोत्तम पार्ट कैसे होगा? अपने संकल्प, वचन व कर्म पर ध्यान देने से। जितना हम ज्ञान को ध्यान से सुनते हैं उतना ही कर्म में, सम्बन्ध में ज्ञान को यूज़ करते हैं। ज्ञान से हमारा सम्बन्ध बाबा से ऐसा हो जो लौकिक में यह भान न रहे कि यह मेरी बेटी है, मेरी बहन है… अगर मेरा छूटा हुआ है तो उनसे भी मेरा टूट जाता है। कैसी भी परिस्थिति में पुराना कोई याद न आये। अभी सब नया है। ज्ञान ने हमको नया बना दिया, नवीनता आ गई। यह हमारा जन्म दिव्य है। पढ़ाई है ही देवता बनने के लिए। ज्ञान मंथन करने से समझ में आता है, बुद्धि में बैठता है। ज्ञान मेरे जीवन में कहाँ तक आया है। जिससे मैं ज्ञानी तू आत्मा, बाप की प्रिय आत्मा बन जाऊं। वह तब बन सकती जब संकल्प, वचन में ज्ञान हो, ज्ञान युक्त, युक्तियुक्त हो, फिर योग अच्छा रहेगा।

ज्ञान दाता से देने वाले बाप से योग होगा। अन्दर से शुक्रिया निकलेगा बाबा आपने कितना अच्छा समझाया है। हम दे रहे हैं, नहीं। दाता का दिया हुआ है। देह अभिमान का दरवाजा बन्द करना है, अभिमान आये ही नहीं उसके लिए करनकरावन बाबा तू है। करता वही है, अभिमान आने की आवश्यकता नहीं है। काम हमने कुछ किया ही नहीं है, अभिमान फालतू झूठा लेकर बैठे हैं। सच का अभिमान नहीं होता। सच स्वत: दिखाई पड़ता है। जब तक झूठ मिक्स है तो देह अभिमान होता। सच से प्रीत है तो देह अभिमान रह नहीं सकता। जितना आगे बढ़ते जाते, आत्मा शुद्ध होती जाती तो सच्चा सोना दिखाई देता। बाबा कहते- जो अलाएं मिक्स हैं उसे निकालो। बाबा से गहरा सम्बन्ध रखो तो वह निकले।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments