शिवरात्रि सर्व पर्वों में महान पर्व क्यों है? और सभी बड़े प्यार से इस त्योहार को मनाते हैं। इसके पीछे ये भाव है कि इस पावन पर्व पर शिव का रूप भोलानाथ की तरह होता है। हम थोड़ा-सा भी पुरुषार्थ करें तब भी वे भोला बनकर सर्वस्व लुटाते हैं। इसी की यादगार में कई भक्त लोग रातभर जागरण करते हैं और कई तो निर्जला व्रत भी रखते हैं।
वैसे देखा जाए तो दोनों ही बहुत उपयुक्त नाम दिए हुए हैं। शिव की जयंती अर्थात् परमात्मा शिव के दिव्य जन्म या दिव्य अवतरण और वो दिव्य अवतरण इस संसार की अज्ञान रात्रि के समय जब चारों ओर घोर अज्ञानता का अंधकार छाया हुआ होता है तो ऐसे समय पर ही परमात्मा शिव का दिव्य अवतरण इस संसार में होता है। और उसी की याद में हम सभी बड़े धूमधाम से महाशिवरात्रि सारे भारत भर में मनाते हैं।
मैं समझती हूँ कि भारत का एक गाँव भी कोई ऐसा नहीं होगा जहाँ परमात्मा शिव का ये दिव्य जन्मोत्सव मनाया ना जाता हो। शास्त्रों के अनुसार अगर देखा जाए तो शास्त्रों में तीन कथाएं हैं-
प्रथम कथा, जिसमें दिखाया कि एक शिकारी शिकार करने निकला था परंतु सारा दिन उसे कोई शिकार प्राप्त नहीं हुआ। अंधकार होने को आया था तभी उसे एक हिरण दिखाई दिया। उस हिरण का पीछा करते हुए जैसे ही उसको मारने जा रहा था तो हिरण ने आकर शिकारी को कहा कि हे शिकारी! मैं अपने बच्चों से मिलकर आती हूँ, उसके बाद तुम मेरा शिकार कर लेना। शिकारी ने कहा कि मैं कैसे विश्वास करूँ तुम्हारा? कहा कि मैं सही कह रही हूँ मेरे बच्चे घर में अकेले होंगे, इंतज़ार कर रहे होंगे, मैं उनसे छुट्टी लेकर आती हूँ। अब रात्रि का समय था तो शिकारी क्या करता! सोचा जंगल है, जंगली जानवर होंगे तो एक पेड़ पर चढ़ गया और वो पेड़ था बेल पत्र का। उसपर चढ़ गया तो सोचा जब तक हिरण आवे तब तक मैं इस पेड़ पर ही बैठ जाऊँ। लेकिन कहीं मेरी नींद न लग जाए और कहीं गिर गया तो कोई न कोई शिकार कर लेगा उसका। तो खुद जागृत रहने के लिए उसने बेल पत्र के पत्ते तोडऩा आरंभ किया और बेल पत्र नीचे गिराना आरंभ किया।
ठंडी के दिन थे, कांप रहा था ठंडी के मारे, तो मुख से शिव-शिव निकल रहा था और पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था। तो उसपर बेल पत्र पड़ते गए। सुबह होने को ही आई। जैसे ही उसने देखा कि सामने हिरण आ रहा है और नीचे उतरा तो उसी समय शिवजी प्रगट हुए उसके सामने और कहा तुमने सारा दिन उपवास भी किया, सारी रात मेरी भक्ति भी की, बेल पत्र भी लाखों चढ़ाए मेरे ऊपर। और सारी रात जागरण भी किया। इसीलिए तुम मांगों जो मांगोगे वो मिल जाएगा।
कहा जाता है कि शिवजी इतने भोले हैं कि सारी रात उस शिकारी ने ऐसे किसी उद्देश्य से न जागरण किया था, न उपवास और न ही बेल पत्र डाले थे। फिर भी भोलेनाथ अनजानेपन में भी किए गए कर्म को सहर्ष स्वीकार करके, प्रसन्न होकर वरदान दे देेते हैं। ये एक कथा है कि कैसे शिवजी प्रगट होकर भक्तों की भावना को पूर्ण करते हैं।
शास्त्रों में दूसरी कथा ये आती है कि शिवजयंती माना शिव पार्वती का विवाह। अब जयंती के समय विवाह हो ये कुछ सही नहीं लगता है। परंतु फिर भी भक्त उस बात को बहुत ही धूम-धाम से मनाते हैं कि शिव पार्वती का विवाह हुआ था इस दिन।
तीसरी कथा ये कि जब समुद्र मंथन हुआ देवासुर के बीच में और उसमें से सबसे पहले जब हलाहल निकला तो देवताएं बेहोश होने लगे। जब बहुत कम देवताएं बच गए तब कहा जाता है कि सभी ने शिवजी को पुकारा और शिवजी सारा हलाहल अपने कंठ में समा लेते हैं। तो इसको शिवरात्रि पर जोड़ दिया गया है कि ये वो ही दिन है जिस दिन शिवजी ने हलाहल को स्वीकार किया था।
अब ये तीन कथाएं भक्ति मार्ग में हम सभी ने सुनी हैं। लेकिन सही क्या है? आध्यात्मिक अर्थ के आधार से उसको देखा जाए तो वास्तव में मनुष्य आत्माओं ने भले अनजानेपन में अपनी समझ के हिसाब से, जिस भी तरह से परमात्मा शिव की आराधना की या उपवास किया, जागरण किया, वास्तव में जागरण कोई 24 घंटे वाली दिन और रात की बात नहीं है। लेकिन जैसे मैंने कहा कि शिवरात्रि ये सूचक है कि जब इस संसार में घोर अज्ञानता की रात्रि छा जाती है तब परमात्मा शिव का दिव्य अवतरण होता है। और ऐसी रात्रि के समय जो अपनी आत्म ज्योति को जगा लेता है साथ ही साथ उपवास अर्थात् निरंतर मन के वास को उस प्रभु में एकाग्र करते हैं और भक्ति अर्थात् प्रेम से उस परमात्मा को याद करते हैं। ऐसी ही जब याद में मग्न स्थिति हो जाती है तो परमात्मा अपने भक्तों के उन संकल्पों को पूरा करते हैं, मनोकामना को पूर्ण करते हैं।




