मुख पृष्ठलेखवर्तमान समय में ब्राह्मण आत्माओं का ईश्वरीय कर्तव्य

वर्तमान समय में ब्राह्मण आत्माओं का ईश्वरीय कर्तव्य

आज चारों तरफ विनाश के बादल घिर चुके हैं- प्रकृति असंतुलित है, मनुष्य की बुद्धि अशान्त है, समाज में अविश्वास और असुरक्षा बढ़ रही है। ऐसे नाज़ुक समय में ईश्वरीय परिवार के ब्राह्मण बच्चों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। हम केवल साधारण मनुष्य नहीं बल्कि शिव पिता के रूहानी सेवक हैं, जिन्हें इस अहंकारमयी युग मेंक्रमन्सा शान्ति के सागर की किरणें फैलानी हैं।

आत्म-चेतना में स्थित रहना- शक्ति और शान्ति का मूल – बाबा ने बार-बार कहा है कि ”अब देह-भान से मुक्त आत्मा की स्मृति में रहो” यही वर्तमान समय का प्रथम पुरुषार्थ है। जब आत्मा स्वयं को ज्योति बिन्दु समझती है और परमात्मा शिव से शक्ति-संयोग जोड़ती है, तब वह असीम शान्ति और स्थिरता की अनुभूति करती है। आत्मिक भाव की इस स्थिति से मन्सा शक्ति उत्पन्न होती है जो अदृश्य रूप से वातावरण को परिवर्तित करती है। आज समय पुकार रहा है कि हम ”श्रेष्ठ-विचार” के योगी बनें और अपनी हर सोच को शुभ, श्रेष्ठ और सात्विक बनाएं- ताकि विचारों की कम्पन्नेें इस दु:खी संसार को ठंडक पहुंचाएं।

मन्सा सेवा द्वारा विश्व शान्ति की ज्योति जलाना – ईश्वरीय सेवा का सर्वोच्च माध्यम आज मन्सा सेवा है। जब हम योग में बैठते हैं और सच्चे प्रेम से ”शान्ति” के प्रकम्पन्न चारों दिशाओं में भेजते हैं तो वे दिव्य शक्तियाँ नकारात्मकता को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करती हैं। विनाश के इन बादलों के बीच हमें ”जीवित दीपक” बनकर रहना है – जो स्वयं जले और दूसरों को प्रकाश दे। हर दिन कुछ समय विश्व कल्याण के संकल्पों में लगाना यही सच्चा ईश्वरीय कार्य है।

ईश्वरीय मर्यादाओं में रहकर आदर्श प्रस्तुत करना – ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियों का जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि मानवता के लिए उदाहरण है। वर्तमान समय में जब मूल्य समाप्त हो रहे तब हमें पवित्रता, संयम, सत्य और निश्छल सेवा के आदर्श को जीवन में धारण करना है। हमारा हर कर्म, हर वाणी और हर दृष्टि ऐसे बनें कि देखने वाला अनुभव करे- ”यह आत्मा कोई ऊंच सत्ता से जुड़ी हुई है” यही निवारिणी जीवन की पहचान है।

निरंतर योग-स्मृति द्वारा आत्मा को जल बनाना, ज्वाला नहीं – जब संसार की हवाएं तपन और क्रोध में जल रही हों तब ब्राह्मण आत्मा को ”शीतल जल” बनना है। इसके लिए बाबा की याद का अभ्यास निरंतर और गहरा होना चाहिए। योग की ठण्डी लहरें ही दूसरे के मन की आग को शान्त कर सकती हैं। अपने भीतर के संकल्पों को दिव्य बनाकर ही हम विश्व में शान्ति की तरंगें फैला सकते हैं।

आज का समय पुकार रहा है- ”हे ब्राह्मण आत्माओं जागो और अपने मूल स्वरूप में लौटो” विनाश के इस संगमयुग में ही सच्चा निर्माण छिपा है। जब हम आत्म-चेतना में रहकर परमात्मा के सच्चे सहयोगी बनते हैं, तभी हम विश्व को एक नया सवेरा दे सकते हैं। शान्ति के सागर से शक्ति लेकर उस शीतल प्रवाह को मन्सा रूप में पूरे संसार में फैलाना- यही आज ब्रह्मावत्सों का सर्वोच्च ईश्वरीय कत्र्तव्य है।

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