मुख पृष्ठलेखपरमात्मा का 'ज्योति स्वरुप' सभी ने स्वीकारा

परमात्मा का ‘ज्योति स्वरुप’ सभी ने स्वीकारा

सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में ज्योति, लाइट, प्रकाश, नूर, ओंकार कहकर परमेशवर परमसत्ता, निराकार, परमात्मा की सत्ता स्वीकारी।

विश्व के सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा शिव की महिमा गाई हुई है। वो सर्वोच्च है, सर्वज्ञ है। जहाँ श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के पहले रामेश्वरम ने शिवलिंग की पूजा की। गुरुवाणी में कहा है एकोंकार निराकार, मुस्लिम धर्म में अल्लाह को नूर कहा, जीसस में कहा गॉड इज़ लाइट। इस तरह निराकार ज्योतिर्मय परमात्मा का यादगार ज्योतिर्लिंग दिखाया है। जिसका सभी धर्मों में स्मरण किया गया है। क्योंकि सारी सृष्टि के रचनाकार सृजनहार, पालनहार, वही परमसत्ता, परमात्मा परमेश्वर ही है।

विश्व के सभी धर्मों की आध्यात्मिक शिक्षाओं को ध्यान से देखने पर प्रस्फुटित होता है कि भले ही भाषाएं, रीति-रिवाज़ और उपासना-पद्धतियां भिन्न हों, परंतु सर्वशक्तिमान परमात्मा का स्वरूप एक ही है – निराकार, ज्योति स्वरूप, और कल्याणकारी। मानव इतिहास में चाहे जिस युग में धर्म प्रकट हुआ हो, प्रत्येक ने परम सत्ता को अपने-अपने तरीके से, परंतु समान भाव से स्वीकार किया है।

भारतीय धर्म ग्रंथों में श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया गीता ज्ञान परमात्मा के निराकार और परमपिता स्वरूप की गहरी झलक देता है। युद्धभूमि पर अर्जुन को दिए गए उस परम ज्ञान को ईश्वर को अजन्मा, अविनाशी और प्रकाशमय बताया गया है। इसी प्रकार श्रीराम ने भी रावण से युद्ध से पूर्व रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना कर उस परम ज्योति-स्वरूप ईश्वर की आराधना की, जो बताता है कि ईश्वर कोई देहधारी नहीं, बल्कि प्रकाश स्वरूप पिता है।

इन सभी धर्मों की शिक्षाओं का सार एक ही बात को उजागर करता है- निराकार ज्योति लिंग परमात्मा ही समस्त सृष्टि के रचनाकार, संचालक और पालक हैं। मानवता के विविध मार्ग अंतत: उसी एक परम सत्य तक पहुँचते हैं। नाम भले अलग हों, परंतु लक्ष्य एक है – परमपिता, वह ज्योति स्वरूप परमात्मा, जो अनादि भी है और अविनाशी भी।

नूर ए इलाही – मुस्लिम धर्म में मान्यता है कि जीवन में एक बार मक्का-मदीना की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। इस पवित्र पत्थर का दर्शन मुसलमानों के लिए आवश्यक माना गया है। वो भी निराकार है, जिसकी कोई साकार आकृति नहीं है। उसको ही संग-ए-असवद और अल्लाह कहा। उसे वो लोग नूर-ए-इलाही भी कहते हैं। नूर-ए-इलाही अर्थात् वो नूर, वो तेज, वो तेजोमय स्वरूप जिसको हमने ज्योतिर्लिंगम व ज्योति स्वरूप कहा है। ज्योति माना ही तेज। अत: सभी धर्मों ने किसी न किसी रूप में उस परम सत्ता की शक्ति को स्वीकारा है। उसके अलावा विश्व भर के सभी वेद, शास्त्रों, उपनिषद, ग्रंथ आदि सभी में कहीं न कहीं परमात्मा के ज्योतिस्वरूप की व्याख्या की गई है। वो ही त्रिलोकीनाथ, तीनों लोकों के ज्ञाता, परमपिता परमेश्वर, परमात्मा शिव हैं। ईसाई मत में भी ”गॉड इज़ लाइट” कहकर प्रभु को ज्योति स्वरूप माना गया है। चर्च में जलाई जाने वाली मोमबत्ती उसी अनंत प्रकाश का प्रतीक है।

निराकार, निर्वैर, सत्नाम – सिक्ख धर्म में गुरुनानक देव जी ने कहा है कि एकोंकार निराकार, उन्होंने स्पष्ट शब्दों में परमात्मा के सत्य स्वरूप का वर्णन किया है। वो निराकार है, निर्वैर है, सत्नाम है, जिसको कभी कोई काल नहीं खा सकता। ये सभी महिमा गुरु वाणी में लिखी गई है। हमने ज्योतिर्लिंगम कहा उन्होंने निराकार, निर्वैर, सत्नाम कहा। गुरुनानक देव जी को हमेशा ऊपर की तरफ अंगुली करते दिखाया गया है।

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