आज संसार जिस दहलीज़ पर खड़ा है वहाँ चारों ओर असुरक्षा, अशान्ति, कलह और मूल्यहीनता की गहरी छाया दिखाई देती है। मानव ने विज्ञान, तकनीक, सुविधाओं में अत्यधिक प्रगति की है लेकिन मन की शांति, प्रेम और पवित्रता लगातार दूर होती जा रही है। आज का मनुष्य बाहरी दुनिया को तो संवार रहा है, किंतु अपने अंतर-चेतना, संस्कारों और चरित्र को सँवारने में असमर्थ हो गया है। ऐसे समय में परमात्मा के अवतरण की आवश्यकता और भी महत्त्वपूर्ण बन जाती है।
मनुष्य कितना भी महान क्यों न हो, वह त्रुटिरहित नहीं है। वह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से प्रभावित हो जाता है। इन पाँच विकारों से मुक्त हुए बिना, दुनिया में स्थायी शांति और सुख स्थापित नहीं हो सकते। मनुष्य स्वयं इन विकारों का दास बनकर जी रहा है – तो वह दूसरों को कैसे मुक्त करेगा? यही कारण है कि कुछ कार्य ऐसे हैं जो मनुष्य नहीं कर सकता, जिन्हें केवल परमात्मा ही कर सकते हैं :
- आत्मा को उसके मूल स्वरूप शांति, पवित्रता, प्रेम और शक्ति का सच्चा ज्ञान देना।
- निराकारी, निरहंकारी और निर्विकारी स्थिति का वास्तविक अनुभव कराना।
- पुरानी, विकृत हुई सृष्टि का पुन: सृजन करना, जिसे शास्त्रों में सत्ययुग या स्वर्णिम युग कहा गया है।
- कर्मों का स्टीक ज्ञान और पवित्रता की शक्ति देना, ताकि आत्माएं पुन: उच्चतम बन सकें।
आज संसार में जो अराजकता, नैतिक पतन और मानसिक तनाव है, वह स्पष्ट संकेत है कि मानव प्रयासों से अब यह विश्व सुधरने वाला नहीं। ऐसी घड़ी में परमात्मा स्वयं पिता, शिक्षक, सतगुरु बनकर आता है और हमें राजयोग की शिक्षा देकर भीतर से रूपांतरित करता है।
इसलिए आज सबसे बड़ी ज़रूरत परमात्मा के इस दिव्य अवतरण की है – क्योंकि उसी के माध्यम से ही नई, श्रेष्ठ, पवित्र और शांतिमय दुनिया पुन: स्थापित हो सकती है। चौथा और अत्यंत महत्वपूर्ण कत्र्तव्य है – आत्माओं को मुक्ति और जीवन मुक्ति की प्राप्ति कराना। परमात्मा योगबल द्वारा आत्माओं के पाप कर्मों का बोझ समाप्त करते हैं, जिससे वे बंधनों से मुक्त होकर सुख-शांति का अनुभव कर सकें। इस प्रकार परमात्मा का आगमन मानवता के उद्धार, संस्कार परिवर्तन और दिव्य विश्व व्यवस्था की पुनस्र्थापना के लिए होता है। उनका आगमन ही सृष्टि की नई सुबह का आरंभ है।




