जैसे ही हम किसी के लिए गलत विचार रचते हैं तो अपने लिए भी एक गलत विचार रचते हैं। फिर हम एक-दूसरे से दूर होने लगते हैं और तब वो हमारी अच्छी सलाह भी नहीं सुनते। क्योंकि जब उन्होंने हम पर गलत का लेबल लगा दिया तो उन्हें हमारी हर बात गलत ही लगने वाली है।
हमारे विचार अलग हो सकते हैं, संस्कार अलग हो सकते हैं, लेकिन आधार में परस्पर-सम्मान ही होना चाहिए। अनुशासन भले यह कहे कि आपको समय के पहले आना है, लेकिन देरी से आने पर मैं आपकी अवमानना नहीं कर सकती। बच्चे का संस्कार अलग है इसका मतलब ये नहीं कि वो कुछ भी करे, कुछ भी खाए, कभी भी उठे, कभी भी सोए। एडजस्ट करने का मतलब है उसके संस्कार को समझते हुए, स्वीकारते हुए, उसको अनुशासित करना है। यह हम तभी कर सकेंगे, जब एक-दूसरे के समीप होंगे। लेकिन अगर हमने परस्पर-सम्मान का रिश्ता नहीं बनाया तो यह नहीं होगा।
संस्कार कितना भी भिन्न हो, उसको हमेशा भिन्न ही कहना। दोनों अपने-अपने नज़रिए से बिल्कुल सही हैं। हम एक-दूसरे के संस्कार को स्वीकार करते हैं तो एक-दूसरे के संस्कार को बदलने में भी मदद करेंगे। लेकिन दूसरे के संस्कार को बदलने के लिए पहले उनके मौजूदा संस्कार को स्वीकार करना होता है। इसका मतलब है पहले उनको अपने नज़दीक लाना पड़ेगा। अगर नकारा तो वो दूर चले जायेंगे।
किसी को झूठ बोलने की आदत हो सकती है, किसी को लेट आने की आदत हो सकती है, किसी को काम समय पर पूरा न करने की आदत हो सकती है। किसी की एक आदत ही लें, ज्य़ादा लंबी लिस्ट नहीं बनाएं। अब अगला मंत्र अपने में यह जपें कि मैं उन्हें इसी रूप में स्वीकार करता हूँ या करती हूँ। इससे ये संस्कार बाहर ही रह जाएगा, आपके मन को वह मलिन नहीं करेगा।
संस्कार उनका है, व्यवहार उनका है, लेकिन इसके बाद वो आपके मन पर कुछ लेकर नहीं आएगा। उनके संस्कार में इतनी शक्ति नहीं है कि आपके मन को कष्ट दे।
आपके पास दो विकल्प हैं- या तो आप मुझे बोलो कि मैं बदलूं, और यह ज़रूरी नहीं है कि आपके बोलने के बाद मैं बदल जाऊंगी। मैं कह सकती हूँ कि मुझे इस तरह से जीने में कुछ गलत लगता नहीं।
या मैं कहूँ कि मैं आपके कहने पर क्यों चेंज करूं? या यह कि मैं बदलना चाहती हूँ, लेकिन मुझसे यह होता नहीं। यानी मैं उस संस्कार के परवश हूँ। तो ये सारा कुछ मेरे बारे में है। मेरा संस्कार, मेरे चयन, मेरा उनके अधीन होना, लेकिन आप इसे देख-देख कर अपने मन में हलचलें पैदा क्यों करो?
हमें याद रखना है कि हम सुबह व्हाइट सर्कल से निकलेंगे और रात को हमें व्हाइट सर्कल लेकर ही घर आना है वापस। जैसे अगर हम सुबह सफेद वस्त्र पहनते हैं तो उसे मैला होने से बचाना कठिन है। व्हाइट सर्कल के साथ भी ऐसा ही है। लेकिन थोड़ा-सा ध्यान रखना होता है।
गहरे रंगों की पोशाक पहनी है तो कहीं भी बैठो, कुछ भी खाओ, कुछ फर्क नहीं पड़ता। लेकिन सफेद कपड़े वालों को खूब ख्याल रखना होता है। आप अपना व्हाइट सर्कल, अपना आध्यात्मिक अभामण्डल लेकर सारा दिन दुनिया में गये, अलग-अलग संस्कार के लोग मिले। लेकिन अगर आप हरेक की मैल पकड़ते गए तो वो संस्कार उनकी मैल न रहकर आपकी हो जाएगी।





