पुराने संस्कारों का समाप्ति समारोह
बाप भी बेहद का, वर्सा भी बेहद का, अधिकार भी बेहद का लेकिन लेने वाले नम्बरवार बन जाते हैं, ऐसा क्यों? इसके सार रूप में दो कारण हैं-1. बुद्धि में स्वच्छता नहीं और मन की लाइन क्लियर नहीं। 2. हर कदम में सावधानी नहीं अर्थात् केयरलेस है परन्तु केयरफुल नहीं। ब्राह्मण जीवन का मुख्य आधार क्या है? मुख्य आधार कहो, नवीनता कहो, अलौकिकता कहो, जीवन का श्रृंगार कहो, वह है ही पवित्रता और मर्यादा। ब्राह्मण जीवन की चैलेंज ही है कामजीत, क्रोधजीत, यही असंभव से संभव कर दिखाने की श्रेष्ठ से श्रेष्ठ ज्ञान और श्रेष्ठ ज्ञानदाता की निशानी है। जैसे नामधारी ब्राह्मण की निशानी चोटी और जनेऊ है। वैसे सच्चे ब्राह्मण की निशानी – स्वच्छता अर्थात् पवित्रता और मर्यादाएं हैं। पवित्रता की पहली आधारमूर्त प्वाइंट स्मृति की पवित्रता। आत्मा शब्द सभी कहते हैं लेकिन सब ब्राह्मण आत्मा यही कहेंगे कि मैं शुद्ध आत्मा हूँ, मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, पूज्यनीय आत्मा हूँ, मैं पूर्वज आत्मा हूँ, यह स्मृति की स्वच्छता। यदि वृत्ति और दृष्टि यह स्मृति का फाउंडेशन कमज़ोर है, फिर महापाप होता है। सदा सावधानी हर पल रखनी है कि संकल्प से, वृत्ति से व दृष्टि में भी गफलत ना हो, इतना केयरफुल रहना है। श्रेष्ठ परिवार है तो सबको श्रेष्ठ वृत्ति और दृष्टि से ही देखो। पवित्र स्मृति रखो और भाई-भाई की वृत्ति रखो, अब हद के पुराने और कमज़ोर संस्कारों का समाप्ति समारोह मनाओ, तब सम्पूर्ण सम्पन्न समारोह होगा।



