यह एक बहुत ही सूक्ष्म लेकिन सच्चा अनुभव है कि भगवान से मिलन हो जाने के बाद भी कभी-कभी जीवन में वह सम्पूर्ण आनंद, तृप्ति और श्रेष्ठता की अवस्था स्थायी नहीं रहती। ऐसा लगता है जैसे जल के सागर के पास खड़े होकर भी प्यास बनी रहती है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा का गहरा सत्य है, जिसे समझना और जानना आवश्यक है।
1. मिलन और स्थिति में अंतर – भगवान से मिलन होना एक घटना है, पर श्रेष्ठ स्थिति में टिकना एक अभ्यास है। जैसे कोई दीपक जल तो जाए, लेकिन यदि हवा तेज हो तो लौ काँपने लगती है। उसी प्रकार, भगवान की पहचान और मिलन के बाद भी यदि पुराने संस्कारों की हवा चलती रहे, तो आनंद की लौ स्थिर नहीं रह पाती। जैसे कोई व्यक्ति शुद्ध जल के स्रोत तक पहुँच जाए, लेकिन उसे पीने की आदत ही न डाले, तो प्यास कैसे बुझेगी? भगवान मिलना स्रोत तक पहुँचना है, पर रस लेना रोज़ का अभ्यास है।
2. संस्कारों का बोझ आनंद को ढक देता है – कई जन्मों के संस्कार क्रोध, अपेक्षा, अधिकार, अधीरता एकदम समाप्त नहीं हो जाते। जब कोई परिस्थिति इन संस्कारों को छू लेती है, तो आत्मा अपनी ऊँची स्थिति से नीचे उतर आती है। जैसे साफ शीशे पर थोड़ी-सी धूल पड़ जाए, तो प्रतिबिम्ब धुँधला दिखने लगता है। शीशा टूटा नहीं है, केवल सफाई चाहिए। वैसे ही आत्मा अशुद्ध नहीं हुई, केवल स्मृति की सफाई चाहिए।
3. बाहर की खुशी और भीतर के आनंद का भ्रम – कई बार हम भगवान से मिलने के बाद भी परिस्थितियों से सुख चाहते रहते हैं। जब परिस्थितियाँ मनचाही नहीं होती, तो मन उदास हो जाता है। जैसे राजा के पास खज़ाना होते हुए भी अगर वह रोज़ प्रजा की सराहना पर निर्भर हो, तो वह राजा होते हुए भी असंतुष्ट रहेगा। वैसे ही आत्मा के पास ईश्वरीय खज़ाना होते हुए भी, जब वह बाहरी स्वीकृति चाहती है, तो आनंद पूरा नहीं हो पाता।
4. आनंद के लिए पवित्रता अनिवार्य – जहाँ दृष्टि, वृत्ति और कृति में मिलावट होती है, वहाँ आनंद टिक नहीं सकता। पवित्रता आनंद की नींव है। शुद्ध घी में मिठास स्वाभाविक होती है, लेकिन यदि उसमें थोड़ा-सा पानी मिल जाए, तो स्वाद बिगड़ जाता है। वैसे ही जीवन में थोड़ी-सी अपवित्रता भी आनंद की मिठास को कम कर देती है।
5. समाधान – अनुभव से अभ्यास तक – संपूर्ण आनंद पाने के लिए ज्ञान को अनुभव और अनुभव को अभ्यास में बदलना आवश्यक है…
- 1) दिन में बार-बार आत्म-स्मृति
- 2) हर कर्म से पहले एक पल के लिए शान्त स्थित होना
- 3) हर आत्मा के लिए शुभ भावना
- 4) प्रतिदिन सोने से पहले दिनभर की शांति की स्टेज की चेकिंग – जैसे संगीत सीखने वाला रोज़ रियाज़ करता है, तभी सुर स्थिर होते हैं। एक दिन अच्छा गा लेने से कलाकार नहीं बनता।
भगवान मिलने के बाद भी यदि सम्पूर्ण आनंद की स्थिति नहीं बनती, तो निराशा का विषय नहीं, बल्कि और ऊँचा उडऩे का संकेत है। जब आत्मा निरंतर अभ्यास द्वारा अपने संस्कारों को शुद्ध करती है, तब भगवान का मिलन केवल स्मृति नहीं रहता, बल्कि हर श्वास में आनंद बन जाता है। यही सच्ची तृप्ति और यही पूर्ण सौभाग्य है।





