मुख पृष्ठलेखदिलततनशीन भविष्य के राज्यतख्त अधिकारी

दिलततनशीन भविष्य के राज्यतख्त अधिकारी

संगमयुग वह शुभ समय है जब परमपिता परमात्मा स्वयं आकर हमें श्रेष्ठतम आत्माओं की तरह तैयार करते हैं। बाबा मुरली में हमें उन विशेष बातों की याद दिलाते हैं, जिन्हें जीवन में धारण करने से हम उनके दिलततनशीन बनते हैं और यही योग्यता आगे चलकर हमें सतयुग राज्यपद के अधिकारी बनाती है। इस युग में आत्मा को जो भी दिव्य शिक्षा मिलती है, वही उसके भविष्य के भाग्य का आधार बनती है। इसके लिए विशेष रूप से पाँच बातों पर ध्यान देना और उसे समझना ज़रूरी है…

दृष्टि की पवित्रता बाबा कहते हैं कि ”आँखें धोखा देती हैं”, इसलिए दृष्टि को सिविलाइज़्ड बनाना परम आवश्यक है। देह, रूप, स्वभाव या व्यवहार को देखकर प्रतिक्रिया देना आत्मा को नीचे गिराता है। इसलिए बाबा बच्चों को सिखाते हैं कि हर आत्मा को उसकी मूल स्थिति में देखें— वह भी एक ज्योति-बिंदु, वह भी परमात्मा की संतान है। जब दृष्टि बदलती है, तो संकल्प बदलते हैं और मन की कोमलता व देवत्व जागृत होता है।

सम्मान-स्थिति में स्थिर रहना— सच्ची योग्यता वही है जो निंदा और स्तुति में, मान और अपमान में, लाभ और हानि में, समान भाव रख सके। जो आत्मा परिस्थितियों के अनुसार हिलती-डुलती रहती है, वह दिल-तख्त की अधिकारी नहीं बन सकती। लेकिन जो आत्मा स्थिति में स्थिर, शान्त और संयमवान रहती है, वह बाबा का दिल जीत लेती है। यह आंतरिक स्थिरता ही भविष्य के राजयोग की नींव है।

संपूर्ण पवित्रता— पवित्रता केवल बाह्य अनुशासन नहीं; यह है संकल्पों की शुद्धता, भावनाओं की निर्मलता, दृष्टि की स्वच्छता और स्मृति की उँचाई। जब आत्मा देही-अभिमानी अवस्था में रहती है, तब वह सच्ची पवित्रता का अनुभव करती है। यह पवित्रता ही सतयुग के देवता-जीवन की मुख्य पहचान बनती है।

परमात्मा की संतान होने की स्मृति— बाबा बार-बार समझाते हैं कि ”स्मृति से स्थिति बनती है और स्थिति से भविष्य बनता है।” यदि हम निरंतर यह अनुभव करते हैं कि हम परमात्मा के दिल-तख्त पर विराजमान श्रेष्ठ रचना हैं, तो यह स्मृति आत्मा की शक्ति, आत्म-सम्मान और राज्य करने की योग्यता को बढ़ाती है। आत्म-सम्मान में रहने वाली आत्मा ही भविष्य में सर्व सम्मान की अधिकारी बनती है।

वातावरण से अलिप्त रहना— कलियुग का वातावरण भारी है, परंतु उसके प्रभाव में आना हमारी योग्यता को कम करता है। इसलिए बाबा कहते हैं कि बच्चे वातावरण में रहें, लेकिन अलिप्त और निॢवकारी रहें। जो आत्मा आज न्यारेपन की शक्ति अॢजत करती है, वही कल सम्पूर्ण विश्व के वातावरण को दिव्य बनाने की सामथ्र्य रखती है।

इन सभी बिंदुओं का सार यही है कि आज जो आत्मा परमात्मा के दिल में रहने की कला सीख लेती है, वही कल सतयुग में तख्त-नशीन बनकर शासन करती है। संगमयुग पर दिल-तख्त नशीनता ही भविष्य की राजगद्दी की प्रथम योग्यता है। जो आज स्मृति, पवित्रता, संयम, सिविलाइज्ड़ दृष्टि और अलिप्तता धारण करते हैं, वही सतयुग के स्वॢणम राज्य के प्राकृतिक उत्तराधिकारी बनते हैं।

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