कई बार ऐसा होता है कि हमें यह अनुभूति है कि भगवान मिल गया, ज्ञान भी मिल गया, मार्ग भी मिल गया, फिर भी जीवन में कभी-कभी क्रोध, अशान्ति, अधीनता, कभी-कभी भारीपन, सूनापन आ जाता है। कभी-कभी बोझ-सा लगता है, तो कभी-कभी ठहराव आ जाता है या दृष्टि-वृत्ति-कृति की चंचलता आ जाती है। तब मन में प्रश्न उठता है— ‘भगवान मिलने के बाद भी जो पुरुषार्थ की प्रोग्रेस होनी चाहिए वो नहीं हो पाती, ऐसा लगता है कि सागर के पास होते हुए भी प्यासे रह जाते हैं।’ ऐसी अवस्था होने पर क्या पुरुषार्थ करें, कौन से अभ्यास करने की ज़रूरत है उसके बारे में समझते हैं। इसका उत्तर दोष भावना में नहीं, बल्कि अभ्यास की गहराई में छिपा है।
१. केवल मिलन नहीं, स्थिति में स्थित होना ज़रूरी – भगवान से मिलन होना एक महान सौभाग्य है, लेकिन मिलन का आनंद तभी स्थाई बनता है जब मैं अपनी श्रेष्ठ स्थिति में टिक पाता हूँ। यदि मैं बार-बार पुराने संस्कारों में चला जाता हूँ, तो इसका अर्थ है कि मिलन हुआ है, पर स्थिति स्थिर नहीं हुई, न ही बदली है। उसके लिए प्रैक्टिकल अभ्यास दिन में कई बार 30-30 सेकण्ड के लिए रूककर करें— ”मैं आत्मा हूँ, शान्ति मेरा स्वभाव है, भगवान मेरे साथ है।” जब हमारी सोच में ये होगा तो स्थिति बदलेगी और जब स्थिति बदलेगी तो परिस्थिति अपने आप बदल जायेगी।
2. क्रोध और अधीनता आने पर खुद को दोष न दें, बल्कि चेक करें – क्रोध या अशान्ति आना यह सिद्ध नहीं करता कि भगवान नहीं मिले, बल्कि यह बताता है कि उस समय कनेक्शन ढीला हुआ है। ऐसे समय पर एक फॉर्मूला अपनाएं…
- STOP :-
- S – STOP:- तुरंत रूक जाएं।
- T – THINK:- अभी मैं आत्मिक-भान में हूँ या देह-भान में हूँ?
- O – Observe:- मेरे भीतर कौन-सा संस्कार एक्टिव हुआ?
- P – Plug In:- मन को फिर से भगवान से जोड़ें। यह अभ्यास धीरे-धीरे संस्कारों को कमज़ोर करता है और श्रेस्ठ संस्कारों को प्रबल करता है।
3. दृष्टि, वृत्ति और कृति की पवित्रता का अभ्यास – अशुद्ध दृष्टि पहले आती है, फिर वृत्ति बिगड़ती है और अंत में कृति। इसलिए सुधार दृष्टि से शुरू करें।
हर आत्मा को देखते समय मन में एक विचार चलाएं- ”यह आत्मा भी भगवान की है, यह भी शान्ति का स्वरूप है और वो आत्मिक दृष्टि से मेरा भाई है।” दृष्टि शुद्ध होगी तो वृत्ति स्वत: शुद्ध होने लगेगी।
4. प्यास इसलिए रहती है क्योंकि रस का अभ्यास कम है – भगवान मिलन का आनंद कोई विचार नहीं, एकरस(अनुभूति) है। यदि मन बार-बार बाहर भागता है, तो भीतर का रस कम अनुभव होता है। रोज़ 10-15 मिनट बिना शब्दों के, केवल यह अनुभव करें— ”मैं सुरक्षित हूँ, मैं भगवान की छत्रछाया में हूँ।” यही अभ्यास प्यास को तृप्ति में बदलता है।
5.सम्पूर्ण आनंद के लिए सबसे शक्तिशाली अभ्यास कोई भी कर्म करने से पहले एक सेकण्ड रूककर संकल्प करें—”मैं अनादि सम्पूर्ण हूँ, की स्थिति में स्थित हो जाएं।” ”मैं यह कर्म भगवान के साथ, श्रेष्ठ स्थिति में कर रहा हूँ।” यह छोटा-सा अभ्यास जीवन को ऊँचाई देता है। भगवान से मिलन के बाद भी यदि कभी कमज़ोरी दिखाई दे, तो निराश न हों। यह असफलता नहीं, बल्कि संकेत है कि अभ्यास को और गहरा करना है। जब आत्म-स्मृति, शान्ति, पवित्र दृष्टि और रस का अभ्यास बढ़ता है, तब भगवान मिलने का सम्पूर्ण आनंद, स्वाभाविक रूप से, हर क्षण अनुभव होने लगता है।




