मुख पृष्ठब्र. कु. गंगाधरजब आत्मा हो संतुष्ट, तभी भाग्य है परफेक्ट

जब आत्मा हो संतुष्ट, तभी भाग्य है परफेक्ट

आज के दौर में ‘परफेक्ट भाग्य’ की परिभाषा लगभग पूरी तरह बाहरी उपलब्धियों से जुड़ी हुई है। स्वस्थ शरीर, सफल करियर, आदर्श परिवार, सुंदर घर और आर्थिक सुरक्षा इन सबको हम सौभाग्य का पैमाना मानते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या इन सबके होते हुए भी मन की अशांति हमें भाग्यशाली महसूस करने देती है? यदि भीतर संतोष नहीं, तो बाहर की परिपूर्णता भी अधूरी है।

वर्तमान समय अनिश्चितताओं से भरा है। परिस्थितियां पल-पल बदलती हैं। कभी स्वास्थ्य संकट, कभी आर्थिक उतार-चढ़ाव, कभी सामाजिक दबाव, जीवन का बाहरी परिदृश्य स्थिर नहीं है। ऐसे में यदि हम भाग्य को बाहरी कारकों से जोड़ेंगे, तो हमारी संतुष्टि भी अस्थायी ही रहेगी। बाहरी जगत हमारे पूर्ण नियंत्रण में नहीं, पर हमारा मन, हमारा दृष्टिकोण और हमारी प्रतिक्रिया ये पूर्णत: हमारे हाथ में हैं।

समस्या यह नहीं कि हम बेहतर जीवन चाहते हैं; समस्या यह है कि हमने ‘बेहतर’ को केवल भौतिक मानकों से परिभाषित कर दिया है। हम मान बैठते हैं कि सबकुछ परफेक्ट हो जाए, तब हम खुश रहेंगे। किंतु अनुभव बताता है कि जिनके पास सबकुछ है वे भी अक्सर और चाहिए की दौड़ में लगे रहते हैं। साधनों की प्रचुरता के बावजूद संतोष का अभाव उन्हें भीतर से खाली रखता है। इसके विपरित, सीमित संसाधनों के साथ भी कुछ लोग संतुष्ट और शांत दिखाई देते हैं। अंतर बाहरी वस्तुओं में नहीं, भीतरी स्थिति में है।

आज तुलना हमारी सबसे बड़ी मानसिक चुनौति बन चुकी है। सामाजिक मंचों और आभासी संसार में दूसरों के जीवन का चमकदार पक्ष देखकर हम अपने जीवन को कमतर आँकने लगते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति अपने संघर्षों से गुज़र रहा है। तुलना का यह भाव हमारी आंतरिक ऊर्जा को क्षीण करता है और हमें कृतज्ञता से दूर ले जाता है।

यहीं ‘शुक्रिया’ का संस्कार महत्त्वपूर्ण हो जाता है। कृतज्ञता परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती; वह एक दृष्टिकोण है। यदि हम दिन की शुरुआत धन्यवाद से करें – अपने जीवन, अपने शरीर, अपने सम्बन्धों के प्रति, तो हमारा देखने का चश्मा बदल जाता है। शिकायत का भाव परफेक्ट परिस्थितियों में भी कमी खोज लेता है, जबकि कृतज्ञता अपूर्णता में भी सौंदर्य देख लेती है। इसके अतिरिक्त, जो लोग हमारे जीवन में चुनौति बनकर आते हैं, वे भी हमारे विकास का माध्यम हो सकते हैं। आलोचना, विरोध या असहमति हमारे भीतर की सहनशक्ति, धैर्य और विनम्रता को परखते हैं। यदि हम हर प्रतिक्रिया में अपनी शांति खो देते हैं, तो हम अपनी ही ऊर्जा गंवा बैठते हैं। किंतु यदि हम संतुलन बनाए रखें तो वही परिस्थितियाँ हमारे आंतरिक बल को सुदृढ़ करती हैं।

अत: समय आ गया है कि हम भाग्य की परिभाषा बदलें। परफेक्ट भाग्य का अर्थ यह नहीं कि सबकुछ हमारे अनुरुप हो; बल्कि यह कि हम हर परिस्थिति में संतुलित, संतुष्ट और सकारात्मक बने रहें। बाहरी संसार परिवर्तनशील है, पर मन को स्थिर बनाना संभव है। जब दृष्टिकोण बदलता है, तब जीवन की चुनौतियाँ भी अवसर में परिवर्तित हो जाती हैं। शायद सच्चा सौभाग्य इसी में है- लेने की नहीं देने की भावना में; शिकायत में नहीं, शुक्रिया में; तुलना में नहीं, आत्मचिंतन में। जब मन भरपूर होगा, तभी जीवन सच्चे अर्थों में परफेक्ट कहलाएगा।

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