जैसा आपका नाम है, वैसा ही आपका व्यक्तित्व भी है – आप ज्ञान की सच्ची गीता का साक्षात स्वरूप हैं। अपनी तेजस्वी और ओजस्वी वाणी के माध्यम से आपने अनेक आत्माओं के जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन लाने का महान कार्य किया है।
आपको यह ईश्वरीय ज्ञान वर्ष 1969 में मात्र चौदह वर्ष की अल्पायु में गुजरात के सूरत से प्राप्त हुआ। लौकिक पढ़ाई में भी आप अत्यंत मेधावी छात्रा रहीं और आपने गुजरात मैट्रिक बोर्ड में प्रथम स्थान प्राप्त किया। परंतु इस अलौकिक ईश्वरीय ज्ञान ने आपको इतना प्रभावित किया कि आपने 1972 में अपना सम्पूर्ण जीवन इस ईश्वरीय विश्व विद्यालय को समर्पित कर दिया।
प्रारंभिक समय में आपने गुजरात के अनेक स्थानों पर अपनी सेवाएं प्रदान कीं। लगातार 14वर्षों तक भावनगर में सबज़ोन इंचार्ज के रूप में आपने अत्यंत निष्ठा और समर्पण के साथ सेवाएं दीं। भारत के विभिन्न स्थानों पर आयोजित मेलों और आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भी आपका विशेष सहयोग रहा।
1985 में जब संयुक्त राष्ट्र संगठन(यूएनओ) द्वारा क्रक्रयुवा वर्षञ्जञ्ज मनाया गया, उस समय ईश्वरीय विश्व विद्यालय की ओर से 13 स्थानों से पदयात्राएं निकाली गईं। उनमें सोमनाथ से दिल्ली तक की पदयात्रा का मुख्य संचालन आपने किया।
इसके पश्चात् 1993 से अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय मधुबन के ज्ञानसरोवर में क्रक्रअकादमी फॉर ए बेटर वल्र्डञ्जञ्ज के विभिन्न विभागों में लगभग 17वर्षों तक आपने अपनी विशेष सेवाएं प्रदान कीं। मधुबन में कुमारियों, टीचर्स ट्रेनिंग तथा भर्तियों के क्षेत्र में भी आप एक प्रभावशाली शिक्षिका के रूप में जानी जाती हैं और अपने गहन ज्ञान से आपने अनेकों आत्माओं को लाभान्वित किया है। साथ ही राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के अंतर्गत बिज़नेस एंड इंडस्ट्री विंग के मधुबन कोऑर्डिनेटर के रूप में भी आप अपनी महत्त्वपूर्ण सेवाएं दे रही हैं।

आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान सुनना या धार्मिक कर्म करना नहीं है, बल्कि अपने जीवन को इतना पवित्र और श्रेष्ठ बनाना है कि हम परमपिता परमात्मा के समान गुणों को धारण कर सकें। हम सभी का लक्ष्य केवल आध्यात्मिक मार्ग पर चलना नहीं, बल्कि बाप समान सम्पूर्ण और सम्पन्न बनना है।
हम सभी ज्ञान सुनते हैं, योग का अभ्यास करते हैं और सेवा के कार्यों में भी भाग लेते हैं। इन सबके माध्यम से हमारे जीवन में उत्साह और आध्यात्मिक जागृति आती है। लेकिन दीदी जी समझाती हैं कि इन सभी साधनों का अंतिम उद्देश्य अपने जीवन में ऐसा परिवर्तन लाना है जिससे हम आत्मिक गुणों से भरपूर बन सकें। जब तक हमारे अंदर माया और विकारों का प्रभाव है, तब तक सम्पूर्णता की अवस्था को प्राप्त करना कठिन होता है।
मनुष्य को सबसे पहले माया को पहचानना आवश्यक है। माया वह शक्ति है जो आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से भटका देती है। जब मनुष्य स्वयं को आत्मा के स्थान पर शरीर समझने लगता है और देह तथा देह के संबंधों में अत्यधिक आसक्त हो जाता है, तो यही माया का प्रभाव है। वास्तव में हम आत्मा हैं और आत्मा का धर्म शांति, प्रेम, पवित्रता और आनंद है। लेकिन देह अभिमान के कारण मनुष्य इन दिव्य गुणों को भूल जाता है और विकारों के प्रभाव में आ जाता है।
आज के समय में समाज में जो अनेक समस्याएं दिखाई देती हैं – जैसे अपराध, हिंसा, अपहरण और अन्य सामाजिक बुराइयाँ – उनका मूल कारण मनुष्य के अंदर के विकार हैं। काम, क्रोध, लोभ और अहंकार मनुष्य के चार बड़े शत्रु हैं। ये विकार मनुष्य के स्वभाव को अशांत और असंतुलित बना देते हैं, जिससे व्यक्ति स्वयं भी दु:खी रहता है और दूसरों को भी दु:ख देता है।
विशेष रूप से क्रोध मनुष्य के संबंधों को बहुत अधिक प्रभावित करता है। क्रोध के कारण मनुष्य के मन में द्वेष, नफरत और तिरस्कार की भावना उत्पन्न हो जाती है। जब व्यक्ति क्रोध के प्रभाव में होता है,तो वह दूसरों के प्रति सहनशीलता और प्रेम को भूल जाता है। इसलिए आध्यात्मिक जीवन में क्रोध समाप्त करना अत्यंत आवश्यक है। उसके स्थान पर हमें शांति, धैर्य और सहनशीलता को अपनाना चाहिए।
इसी प्रकार लोभ और लालच भी मनुष्य को गिरा देते हैं। जब मनुष्य धन और सम्पत्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है,तो वह सच्चे सुख और संतोष से दूर हो जाता है। यह संगमयुग भाग्य बनाने का सर्वोत्तम समय है। इस समय जो आत्माएं सेवा, त्याग और नि:स्वार्थ भाव से अपने समय, शक्ति और संसाधनों का उपयोग करती हैं, वे अपने लिए महान भाग्य का निर्माण करती हैं।
राजयोग का अभ्यास मनुष्य को आंतरिक शक्ति प्रदान करता है। जब आत्मा परमात्मा से जुड़ती है, तब उसके अंदर पवित्रता, शांत और प्रेम के गुण जागृत होने लगते हैं। धीरे-धीरे मनुष्य विकारों पर विजय प्राप्त कर लेता है और उसका जीवन एक श्रेष्ठ उदाहरण बन जाता है।
अंतत: हमें अपने जीवन में निरंतर आत्मचिंतन करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि कहीं माया या विकार हमारे जीवन को प्रभावित तो नहीं कर रहे। ज्ञान, योग और सेवा के मार्ग पर स्थिर रहकर हम अपने जीवन को इतना पवित्र बना सकते हैं कि हम वास्तव में बाप समान सम्पूर्ण और सम्पन्न बन सकें।
जब मनुष्य इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तब उसका जीवन केवल स्वयं के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। यही ब्रह्माकुमारीज़ के राजयोग का सच्चा उद्देश्य है – आत्मा का उत्थान और विश्व का कल्याण।




