मुरली(परमात्म महावाक्य) में परमपिता परमात्मा शिव द्वारा दी गई दिव्य शिक्षा मानव जीवन को दिव्यता की ओर ले जाने का सरल और सशक्तमार्ग है। यह शिक्षाएं केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए हैं। ”दाता बनो, मन के मालिक बनो, घर को स्वर्ग बनाओ” – यह हमें कर्तव्यबोध कराता है कि वास्तविक परिवर्तन बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से शुरू होता है। जब मनुष्य अपने मन, विचारों और संस्कारों पर विजय प्राप्त कर लेता है, तभी वह स्वयं के साथ-साथ पूरे संसार में सुख और शांति की लहर फैला सकता है।
ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान में मुरली(परमात्म महावाक्य) में दिव्य शिक्षा मानव जीवन को सरल, सहज और श्रेष्ठ बनाने का मार्ग दिखाती है। ”दाता बनो, मन के मालिक बनो, घर को स्वर्ग बनाओ” – यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन जीने की कला है।
परमपिता परमात्मा शिव हमें यह सिखाते हैं कि हम सभी आत्माएं दाता के बच्चे हैं। हमारा मूल धर्म ही देना है- सुख देना, शांति देना, प्रेम देना। लेकिन जब तक हम स्वयं भीतर से भरपूर नहीं होंगे, तब तक दूसरों को कुछ भी दे नहीं सकते। इसलिए सबसे पहले अपने मन को शांति, प्रेम और शक्ति से भरना आवश्यक है। जब एक व्यक्ति सुखी होता है, तो उसका परिवार सुखी होता है और जब परिवार सुखी होता है तो समाज और संसार में सुख का विस्तार होता है। यही स्व परिवर्तन से विश्व परिवर्तन का सिद्धांत है।
जीवन में अनेक परिस्थितियाँ आती हैं, जहाँ लोग हमें दु:ख देते हैं या हमारी भावनाओं को आहत करते हैं ऐसे समय में मुरली में बाबा कहते हैं ना कि – ”न दु:ख लेना है, न दु:ख देना है।” इसके स्थान पर हमें दुआ देनी है। यदि कोई हमें कष्ट भी दे, तो हमें दिल से ”मेरा बाबा” कहकर परमात्मा को याद करना चाहिए। जैसे एक छोटा बच्चा किसी भी कठिनाई में अपने माता-पिता की शरण में जाता है, वैसे ही हमें भी परमात्मा की शरण में जाना चाहिए। वहाँ हमें शक्ति, समाधान और सच्चा सहारा मिलता है।
मुरली में आत्मिक प्रेम की भी विशेष महत्ता बताई गई है। आज संसार में अधिकांश प्रेम शर्तों पर आधारित है, लेकिन परमात्मा हमें सिखाते हैं कि सच्चा प्रेम नि:स्वार्थ और आत्मिक होता है। हमें हर आत्मा के प्रति समान दृष्टि रखनी चाहिए, चाहे वह कैसी भी हो। जो गलती करे, उसे भी दुआ देना ही सच्ची करुणा और मर्सीफुल स्वभाव है।
इसके साथ ही सहनशक्ति को जीवन में धारण करना भी आवश्यक है। हमें मूर्ति के समान स्थिर और शांत बनना है। जैसे मंदिर की मूर्ति हर परिस्थिति में शांत रहकर आशीर्वाद देती है, वैसे ही हमारा जीवन भी ऐसा होना चाहिए कि हमारे संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को शांति और सकारात्मकता का अनुभव हो। हमारा घर भी ऐसा स्थान बने जहाँ से दुआएं मिलें, न कि अशांति।
पुराने संस्कार जैसे क्रोध, लोभ और अहंकार बार-बार सामने आते हैं लेकिन हमें मन का मालिक बनकर उन्हें नियंत्रित करना है। जैसे हम छोटे बच्चे को गलत कार्य करने से रोकते हैं, वैसे ही अपने मन को भी गलत विचारों से हटाना है। दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से हम अपने संस्कारों को बदल सकते हैं।
अंतत:, परमात्मा हमें प्रेरित करते हैं कि हम अपने जीवन को बदलकर दूसरों के लिए उदाहरण बनें। जब हम दाता बनते हैं, दुआओं का सागर बनते हैं और मन के मालिक बनते हैं, तब हमारा घर स्वर्ग बन जाता है और यही परिवर्तन पूरे विश्व में फैलता है।




