ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के आध्यात्मिक इतिहास में कुछ ऐसी महान आत्माएं हुई हैं, जिन्होंने परमात्मा के दिव्य ज्ञान को गहराई से समझकर उसे अत्यंत सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत किया। ऐसी ही विलक्षण विभूति थे, राजयोगी ब्र.कु. जगदीश चंद्र हसीजा। वे केवल एक प्रखर वक्ता ही नहीं, बल्कि गहन चिंतक, कुशल लेखक और राजयोग के सच्चे साधक थे, जिन्होंने अपने जीवन को परमात्मा की सेवा और विश्व कल्याण के लिए पूर्णत: समर्पित कर दिया।
राजयोगी ब्र.कु. जगदीश चंद्र हसीजा का जीवन ज्ञान, योग और सेवा का अनुपम संगम था। वे प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के मुख्य प्रवक्ता के रूप में विश्वभर में प्रसिद्ध थे। उन्होंने परमात्मा शिव के उस दिव्य ज्ञान को, जो दादा लेखराज कृपलानी(प्रजापिता ब्रह्मा बाबा) के माध्यम से अवतरित हुआ, अत्यंत स्पष्टता और गहराई के साथ मानवता के सामने प्रस्तुत किया।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे ईश्वरीय ज्ञान को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उसके भाव, उद्देश्य और गूढ़ आशय सहित समझते थे। उनकी स्मरण शक्ति और सूक्ष्म बुद्धि इतनी प्रखर थी कि वे परमात्मा के महावाक्यों को बिना लिखे ही सटीक रूप में प्रस्तुत कर देते थे। उनकी वाणी में अनुभव की शक्ति और सत्य की गूंज होती थी, जो सीधे हृदय को स्पर्श करती थी।
जगदीश भाई एक दूरदर्शी योजनाकार भी थे। उन्होंने समय के अनुसार समाज की आवश्यकता को समझते हुए सेवा के नए-नए आयाम स्थापित किए। उनके मार्गदर्शन में संस्था का कार्य पाँचों महाद्वीपों में फैलकर अनेक देशों तक पहुँचा और परमात्मा का संदेश विश्वव्यापी बन गया। वे न केवल ज्ञान के व्याख्याकार थे, बल्कि उस ज्ञान को व्यावहारिक जीवन में उतारने की कला भी सिखाते थे।
उन्होंने वेदों, उपनिषदों और अनेक शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। इसलिए वे शास्त्रों में वर्णित आध्यात्मिक तथ्यों को वर्तमान ईश्वरीय ज्ञान से जोड़कर अत्यंत प्रमाणिक और तार्किक रूप में प्रस्तुत करते थे। उनका यह संदेश अत्यंत स्पष्ट था कि परमात्मा निराकार, ज्योति स्वरूप और एक है, और हम सभी आत्माएं उसकी संतान हैं।
उनकी वाणी में सरलता, मधुरता और स्पष्टता का अद्भुत संगम था। वे जटिल से जटिल विषयों को भी इतनी सहजता से समझाते थे कि हर व्यक्ति उसे अपने जीवन में अपना सके। उनका जीवन स्वयं इस बात का प्रमाण था कि सच्चा राजयोगी वही है, जो ज्ञान, योग और सेवा को अपने जीवन में पूर्णत: धारण करे।
आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम इस महान आत्मा को हृदय की गहराइयों से नमन करते हैं। उनका जीवन और उनकी शिक्षाएं सदैव हमें ज्ञान, योग और सेवा के मार्ग पर आगे बढऩे की प्रेरणा देती रहेंगी।
ऐसे महान योगी, तपस्वी व नयी दुनिया के नीति-निर्माता उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर दिल की गहराइयों से श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।
मेरा व्यक्तिगत अनुभव . . . मुझे भी इस महान आत्मा के सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं, ब्र.कु. गंगाधर भाई,ओमशान्ति मीडिया मासिक पत्रिका का संपादक हूँ। जिसकी शुरुआत 1999 में हुई। जब मेरा प्रथम मिलन जगदीश भाई से हुआ तो उन्होंने अत्यंत सरल और सहज भाव से मुझसे संवाद किया। उन्होंने मुझसे यह जानने का प्रयास किया कि मुझे लेखन और संपादन में क्या आता है और किन क्षेत्रों में मार्गदर्शन की आवश्यकता है।
वे स्वयं ”ज्ञानामृत” के संपादक होने के कारण उन्होंने मुझे संपादन की बारीकियों को बहुत ही सूक्ष्मता से समझाया – कैसे लिखना है, कैसे संपादन करना है, और सबसे महत्त्वपूर्ण, किस प्रकार परमात्मा के संदेश और उसके उद्देश्य को अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना है। उन्होंने विशेष रूप से यह शिक्षा दी कि लेखन और संपादन सदैव निष्काम भाव से होना चाहिए, किसी भी प्रकार के प्रलोभन या प्रभाव से परे रहकर।
उनकी सरलता और मधुरता का प्रभाव इतना गहरा था कि उन्होंने मुझे अपने हाथों से एक पत्र लिखकर दिया, जिसमें उन्होंने मुझे ”ज्ञान की गहराई को समझकर चलने वाली श्रेष्ठ आत्मा” कहकर सम्बोधित किया। यह मेरे जीवन का एक अमूल्य आशीर्वाद है। उन्होंने मुझे यह भी सिखाया कि परमात्मा को जैसा है, वैसा ही स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करना ही सच्ची सेवा है।
आज पिछले 27-28 वर्षों से ”मैं” और ”ओमशान्ति मीडिया” के संपादन का कार्य कर रहा हूँ और इसका पूरा श्रेय मैं उन्हें ही देता हूँ। उनके वचनों, लेखों और साहित्य को पढ़-पढ़कर ही मेरे भीतर ज्ञान की गहराई विकसित हुई। आज भी हर पल उनका मार्गदर्शन और स्मृति मेरे साथ रहती है। वास्तव में उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है – ”जीवन हो तो ऐसा हो।” ……



