मुख पृष्ठदादी जीदादी प्रकाशमणि जीहर एक हो शुभ भावना, शुभ कामना देना अर्थात् सूक्ष्म दुआयें देना

हर एक हो शुभ भावना, शुभ कामना देना अर्थात् सूक्ष्म दुआयें देना

जब हम सम्पन्नता का सोचते हैं तो हमारा अटेन्शन जाता, सम्पन्न बनना अर्थात् कर्मातीत बनना। तो हम सम्पन्न बनें अर्थात् बाप समान बनें, कर्मातीत बनें। तो हमारे पुरुषार्थ का अन्तिम पेपर भी कर्मातीत बनना है। तो कर्मातीत बन रहे हैं या कोई सूक्ष्म कर्म के खाते बन तो नहीं रहे हैं? अगर संकल्प व्यर्थ जाते तो क्या वह व्यर्थ संकल्प हमें कर्मातीत बनायेगा? व्यर्थ संकल्प से समय भी वेस्ट, संकल्प श्वास भी वेस्ट, शक्ति भी वेस्ट तो कर्मातीत कैसे बनेंगे।
तो ध्यान रखना है कि हमारी दिनचर्या में किसी प्रकार का भी स्वयं के प्रति अथवा दूसरों के प्रति व्यर्थ संकल्प न चले। हम आये हैं स्वयं की गति सद्गति करने, तो हमारा दूसरों के पीछे समय क्यों वेस्ट हो, इसलिए न श्वास वेस्ट करो, न समय, न संकल्प। बाबा ने हम सबको टाइटल दिया है सर्व के शुभचिंतक। तो सबके प्रति शुभ भावना रखो, शुभ सोचो, कल्याण की भावना रखो।
अगर कारणे-अकारणे कोई भी कुछ करता उसके लिए भी हमारा संकल्प चलता, तो उसमें भी हमारी एनर्जी वेस्ट जाती। तो अब बाबा ने हम सबको सम्पन्नता का इशारा दिया है इसलिए कोई भी संकल्प व्यर्थ नहीं होना चाहिए। हरेक का ड्रामा में अपना-अपना पार्ट है, हमें हर बात के पीछे शुभ सोचना है और शुभ भावना रख कार्य व्यवहार में भी शुभ वृत्ति को अपनाना है। शुभ भावना ही हमारी मुख्य सेवा है। और सेवा न भी करें, शुभ भावना रखें तो भी चारों तरफ अच्छे वायब्रेशन फैलते रहेंगे।
हर एक को शुभ भावना, शुभ कामना देना अर्थात् सूक्ष्म दुआयें देना जिसको बाबा ने कहा है दुआ देना अर्थात् दाता बनना। तो हमें दाता बनके दुआयें देनी और लेनी हैं। दुआयें सिर्फ देनी नहीं होती परन्तु रिटर्न में दुआयें ऑटोमेटिक मिलती हैं।
अगर कोई प्रैक्टिकल हमसे अनुभव पूछे तो मैं कहती कि बाबा ने मुझे दुआओं में पाला है और दुआओं से आगे बढ़ाया है।
हमें सबकी दुआयें मिलती इससे बड़ा और क्या वरदान है। दुआयें ही वरदान हैं। उन दुआओं का आधार है सदा सर्व के लिए शुभ सोचना और शुभ सोचने वाले में ”मैं-मैं-मैं” नहीं रहती। आप-आप-आप। मैं, मैं करने से दुआ के बदले दूसरों से बद्दुआ मिलती, शुभ भावना से आप-आप करो तो दुआयें मिल जाती। तो हम हैं दाता के बच्चे, हमें देना है न कि लेना है। सब देना सीखो, देने में स्वत: मिल जाता माना लेना होता है।
बाबा ने हमें मंत्र दिया है – निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी बनो। यही अन्तिम महावाक्य याद रखो तो सम्पन्न बन विजय माला के रत्न बन जायेंगे। हमें बाबा के गले का विजयी रत्न बनना है इसलिए सम्पन्नता माना विद ऑनर्स पास होना अर्थात् कर्मातीत बनना। तो मैं मन, वचन, कर्म से, दृष्टि, वृत्ति से बाप के समान कल्याणकारी हूँ? हमारे सामने साकार बाबा एग्जाम्पल है। तो बाबा को फॉलो करते-करते हम बाबा के समान फरिश्ता बनेंगे। तो यह सम्पन्नता की स्थिति का पुरुषार्थ करने से जो कभी-कभी उदासी या टेन्शन आदि होता वह सब खत्म हो जायेगा।
कई बार बाबा हमें समय की सूचना देते कि बच्चे समय को देखते हो, तो तुमको बेहद का वैरागी अथवा उपराम रहना है। जितना बेहद के वैरागी, त्यागी बनेंगे अर्थात् उपराम रहेंगे, उतना ऑटोमेटिकली हमारी याद की यात्रा पॉवरफुल होती जायेगी। यह अशरीरी बनने का अभ्यास सम्पन्न बनने में हमें बहुत मदद करता है।

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