एकाग्रता और अंतर्मुखता का व्रत रखो
एकाग्रता का आधार अंतर्मुखता है। जैसे शक्तियों के जड़ चित्रों में वरदान देने का स्थूल रूप हस्तों के रूप में दिखाया गया है। वरदान का पॉज हस्त, दृष्टि और बैठक एकाग्र ही दिखाते हैं। ऐसे चैतन्य रूप में एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाओ, तब रूहों की रूहानी सेवा कर सकेंगे। अप्राप्त आत्माओं को अशांत, दु:खी, रोगी आत्माओं को दूर बैठे भी शांति, शक्ति और निरोगी भव का वरदान दे सकेंगे। ऐसे सेवा करने के लिए एकाग्रता और अंतर्मुखता का व्रत रखना पड़े। इस व्रत से अन्य आत्माओं की वृत्तियों को परिवर्तन कर सकेंगेे। जैसे भक्त लोग स्थूल भोजन का व्रत रखते हैं, ऐसे ही सर्विसएबुल ज्ञानी तू आत्मा को व्यर्थ संकल्प, बोल, कर्म की हलचल से परे, एकाग्रता अर्थात् रूहानियत में रहने का व्रत लेना पड़े। तब आत्माओं को ज्ञानसूर्य का चमत्कार दिखा सकेंगे। एकाग्रता की शक्ति बहुत विचित्र रंग दिखा सकती है। दुनिया वाले भी एकाग्रता और अंतर्मुखता की शक्ति से ही सिद्धियां प्राप्त करते हैं। स्वयं के शरीर की औषधि भी एकाग्रता की शक्ति से करते हैं और अनेक रोगियों को निरोगी भी बना सकते हैं। कोई चलती हुई चीज़ को रोकना, बारिश को गिराना, बारिश को रोकना, पानी और आग पर चलना यह सब एकाग्रता की सिद्धियां हैं इसलिए जितना समय मिले, दो या पाँच मिनट, तब चले जाओ इस एकाग्रता की और अंतर्मुखता की गुफा में। थोड़ा-थोड़ा, करते-करते जमा होता जाएगा तब शक्तियों द्वारा सर्वशक्तिवान प्रत्यक्ष होगा।




