अपने स्वमान में रह सम्मान देते चलें…

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व्यवहार में हल्की वृत्ति, प्रवृत्ति के कारण ही दु:ख ने हमें घेर रखा है। आज मनुष्य ही मनुष्य को दु:ख दे रहा है। उनमें आई विकृतियों से संबंध में टकराव व अशान्ति का कारण बनता है। ये समझ लेना ही सबसे बड़ी समझदारी है!!!

हमारे साथ यदि कोई बुरा व्यवहार करते हैं, उसी में ही अवस्था हलचल में आती है ना! कई कहते हैं कि मैंने इतना अच्छा व्यवहार किया, फिर भी उसने मेरे साथ क्या किया! क्योंकि आपके पास उनका कोई जमा नहीं है। इसलिए उनका हमारे साथ अच्छा व्यवहार नहीं है। तो आजकल आप देखिये दुनिया में, हर साधन है, सुविधायें हैं, सब चीज़ें क्वालिटी बन गई। आज से 100-150 वर्ष पूर्व तो कुछ भी नहीं था। लोग कितनी मेहनत से जीते थे। आज कितने साधन-सुविधाएं हो गए हैं, परंतु फिर भी सुख-शांति गायब है। अगर इस पर सोचें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि मनुष्य के दु:ख का कारण मनुष्य ही है। आज हमारे आपसी स्वभाव-संस्कार ऐसे हैं, जोकि अभी भी दु:खी होते रहते हैं। चीज़ें अच्छी हो गईं, पर मनुष्य का मनुष्य से व्यवहार अच्छा नहीं रहा। तो हम दूसरों के मालिक तो नहीं बन सकते हैं ना कि भाई, आप ऐसा नहीं बोलो। उनकी अपनी आदत है, संस्कार है तो वो तो बोलेंगे ही। कहते हैं ना कि दूसरों के मुँह पर तो ताला नहीं लगा सकते। बाबा ने हमें ही ज्ञानी बना दिया, सेंसिबल बना दिया। तो हमारे मन, वचन, कर्म अच्छे बन गये। उसने बोला ना… पर मुझे नहीं बोलना है। बाबा कहते हैं, तुम्हारे मुख से क्या निकलना चाहिए, रत्न निकलने चाहिए, पत्थर नहीं। ऐसे-वैसे कड़वे शब्द नहीं, निंदा-ग्लानि नहीं। ये चीज़ें दु:ख देने वाली हैं ना! जिस मुख से बाबा का ज्ञान देते हैं, उस मुख से कड़वे शब्द बोल सकते हैं! नहीं ना! हम भी तो बाबा के बच्चे, बाबा की तरफ से सेवा करने के लिए निमित्त हैं तो हमारे मुख से ऐसी बातें क्यों निकले! रोज़ बाबा के महावाक्य सुनते हैं कानों से, तो तेरी-मेरी कर सकते हैं! क्यों किसी की ग्लानि की बातें सुनें! किसी के बच्चों की ग्लानि करके आप उनके माँ-बाप को खुश कर सकते हैं? नहीं। तो हम क्यों ग्लानि करें! आपस में एक-दो की ग्लानि क्यों करें! जबकि पता है ना, बाबा ने कहा है कि नंबरवार हैं, तो नंबरवार का मतलब है कि कोई न कोई कमी तो रहेगी ना। तो वो बातें हम क्यों करें, वो चर्चा हम क्यों करें! तो हमें इन हल्की वृत्ति-प्रवृत्ति से ऊपर उठ जाना है।
स्वामी विवेकानंद ने अपनी एक किताब में लिखा है कि परचिंतन, तेरा-मेरा, निंदा-ग्लानि, ईष्र्या, ये दासों के संस्कार हैं, राजा के नहीं। हम तो कौन हैं? बाबा कहते हैं ना कि मैं कौन-सा योग सिखाता हूँ? राजयोग। राजऋषि। मैं तो राजा बनाता हूँ, बाकी तुम अपने आप, अपने पुरुषार्थ और सेवा अनुसार अपना पद तय करते हो। तो जितना ज्ञान-स्वरूप होकर आप चलेंगे, उतने हलचल से मुक्त हो जायेंगे। नहीं तो कदम-कदम पर कुछ-न-कुछ होता है और अवस्था बिगड़ती रहती है। किया-कराया पुरुषार्थ ज़ीरो हो जाता है। अगर कोई चीज़ आप बनाओ, फिर बिगाड़ दो, फिर बनाओ, फिर बिगाड़ दो, तो इसको क्या कहेंगे? वेस्ट ऑफ टाइम, मनी, एनर्जी। नंबरवार तो अंत तक रहेंगे। सम्पूर्ण बन जायेंगे, फिर तो चलेंगे घर। तो कब तक अवस्था बिगाड़ते रहेंगे! इसलिए मुझे खुद निर्णय कर लेना है। मुझे खुद लक्ष्य बना लेना है। कोई भी व्यक्ति के कारण से, उनके बोल से, उनके व्यवहार से, उनके ईष्र्या-द्वेष से मुझे डिस्टर्ब नहीं होना है। मुझे अपनी सेवा और अपने पुरुषार्थ में लगे रहना है।
बाबा कहते, मैं इतने अच्छे-अच्छे टाइटल तुम बच्चों को देता हूँ, मास्टर सर्वशक्तिवान, हीरो एक्टर, विश्व सेवाधारी, भगवान के बच्चे, शिव शक्ति, कितने ऊँचे-ऊँचे टाइटल बाबा देते हैं। ये हमारे ही है ना! माना कि हम ऐसे हैं। भगवान हमें जो कह रहा है क्या उस पर निश्चय नहीं है! बाबा कहते हैं, तो उसका नशा चढऩा चाहिए ना!
कोई रॉन्ग टाइटल देगा कि बुद्धू है, कुछ आता नहीं है, तो फीलिंग आ जाती है! अब बताओ, कौन-सी बातें मन पर लगानी चाहिए? जो बाबा हमें इतनी ऊँची नज़र से देखता है, वो नशा और खुशी रहे ना! किसी ने कोई ऐसा-वैसा टाइटल दे दिया तो फीलिंग में क्यों आना है! मतलब हमने स्वीकार कर लिया ना! फीलिंग में आना माना मैंने स्वीकार कर लिया। तो ये बहुत ज़रूरी है कि हम ज्ञान-स्वरूप बनकर चलें। हम बाबा का ज्ञान सुनते हैं, पर सारा दिन फिर यूज़ करना है। इतना तो कोई नहीं समझायेगा। कितना बाबा ने हमें समझाया है! अच्छी ज्ञान की स्टडी चाहिए। मुरली का अध्ययन चाहिए। अध्ययन माना पूरी एकाग्रता से सुनना, समझना, लिखना, सार निकालना, रिवाइज़ करना, तो इसे पूरा अध्ययन कहा जाता है। और इसे अभ्यास में लाना।

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