मुख पृष्ठब्र.कु. शिवानीअपने मन को इतना पॉजि़टिव बनाओ जिससे आस-पास का वातावरण पॉवरफुल बने

अपने मन को इतना पॉजि़टिव बनाओ जिससे आस-पास का वातावरण पॉवरफुल बने

आपका बच्चा आपको आकर कहे कि आप तो बहुत सफल हो लेकिन मैं कुछ भी नहीं हूँ। और मेरे से कुछ होने वाला भी नहीं है। मैं तो आपके चरणों की धूल हूँ। तब आप क्या करेंगे? बच्चे को कहाँ बिठाते हैं? बच्चे को चरणों में बिठाते हैं या गोदी में बिठाते हैं? परमात्मा को हम कहते हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे। लेकिन हम तेरे चरणों की धूल हैं। तू प्यार का सागर है लेकिन तेरे प्यार की एक बूंद के हम अभी तक प्यासे हैं मतलब कि एक बूंद भी नहीं मिली अभी तक? ऐसा हो सकता है कि आपका पिता धनवान भरपूर हो और मेरे पास एक रूपया भी न हो?

जब हम आध्यात्मिक वातावरण में आते हैं तो हमें अच्छा लगता है और कुछ लोग ऐसे वातावरण में आकर थोड़े अच्छे बन जाते हैं। दोनों बातों में फर्क है। अच्छे बन गए हैं मतलब हमारे वायब्रेशन हमें उच्चतर अनुभव होते हैं। अच्छे तो हम सब हैं। लेकिन उस दुनिया में कभी-कभी कोई बोझ, कोई तनाव, कोई चिंता हमारे वायब्रेशन को नीचे लेकर आती है। कुछ वायब्रेशन हमारे अपने बनाए होते हैं। कुछ वायब्रेशन हवा में इतना कुछ है, वो होते हैं। उसी माहौल में हमें सारा दिन बिताना है। हमें पता ही नहीं चलता कि इतनी पॉल्यूशन के बीच रहते-रहते हमारी शक्ति कैसे घट जाती है।
जब हम एक ऐसे माहौल में आते हैं, जहाँ कि वायब्रेशन्स हायर हैं, शुद्ध हैं तो वो हमारे अन्दर की शुद्धता को बढ़ाता है। हम जो आध्यात्मिक वातावरण में अनुभव करते हैं, वो अपनी शुद्धता और शांति को अनुभव करने से होता है। आज दिन तक अपने बारे में क्या कहा था, मैं कौन हूँ। सारा कुछ हमने जो हासिल किया था और उस आधार से हम बड़े-छोटे, ऊंचे-नीचे अपने आपको महसूस करते रहते थे।
इस समय अगर हम सृष्टि को देखें तो बड़ी अनिश्चितता है। अचानक कुछ-कुछ होता जा रहा है। हमने सोचा कोविड सेटल हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन उसके बाद कुछ सेटल हुआ नहीं है। कुछ हो जाता है ठीक होने लग जाता है, फिर कुछ और हो जाता है, कुछ न कुछ चलता ही जा रहा है।
ओम शांति मतलब मैं शांत स्वरूप आत्मा हूँ। बाबा,हम निराकार परमात्मा को कहते हैं। जोकि हमारा पिता है। हम उसको टाइटल से नहीं पुकारते कि भगवान, ईश्वर गॉड। हम कहते हैं वो तो मेरा पिता है। आज दिन तक उसको हमने परमात्मा, भगवान कहा तो अपने लिए क्या कहा। उसको तो कहा आप सर्वशक्तिवान हो और मैं कौन हूँ? मैं शक्तिहीन हूँ। आप प्यार का सागर हो, और मैं प्यार की एक बूंद की प्यासी आत्मा हूँ। आप पवित्रता के सागर हो, मैं नीच, पापी, कपटी हूँ। अगर वो हमारा पिता है तो बच्चे ऐसे होते हैं क्या?
बाबा अर्थात् निराकार परमात्मा। कैसे निराकार परमात्मा आकर हमें अपना परिचय देते हैं, खुद का परिचय देते हैं। फिर स्मृति दिलाते हैं कि मैं प्यार का सागर हूँ तो मेरे बच्चे कैसे होने हैं। मैं प्यार का सागर हूँ तो बाबा कहता है बच्चे और प्यार का सागर हैं। मैं सर्वशक्तिमान हूँ तो मेरे बच्चे और सर्वशक्तिमान हैं। वो हमें याद दिलाता है हम कौन हैं। और याद दिलाकर हमें ऊपर उठाता है। हम तो दिन-प्रतिदिन अपने को कहां लेते जा रहे थे नीचे, नीचे और नीचे।
आपको लगता है पिछले 15-20 सालों में हम अपने वायब्रेशन में थोड़ा नीचे गए हैं। बाहर की प्रगति देखें तो हम ऊपर जाते जा रहे हैं। आंतरिक शक्ति देखें तो हम नीचे आते जा रहे हैं। इतना नीचे आते गए कि हमने अनकम्फर्टेबल इमोशन को नॉर्मल बोलना शुरू कर दिया। हमने कहा स्ट्रेस नॉर्मल है, चिंता नॉर्मल है, दर्द नॉर्मल है, डर नॉर्मल है, तुलना और प्रतिस्पर्धा नॉर्मल है, अटैचमेट नॉर्मल है, ईगो नॉर्मल है, अपेक्षाएं नॉर्मल हैं। जब हमारे वायब्रेशन नीचे होते गए तो सृष्टि के वायब्रेशन क्या होते गये? आपको पता है पिछले तीन साल में सृष्टि के वायब्रेशन शिफ्ट होकर नीचे गए हैं। क्योंकि अचानक डेढ़-दो साल के लिए पूरी पृथ्वी पर करोड़ों लोगों ने कहा डर नॉर्मल है, एंग्ज़ायटी नॉर्मल है, स्ट्रेस नॉर्मल है। दो लोग, दस लोग, लाख लोग कहें तो ठीक लेकिन करोड़ों लोग एक ही समय पर कहेंगे वो भी दो-चार दिन के लिए नहीं साल से ऊपर। इसीलिए कोविड हो गया था पूरा, बाकी सारी चीज़ें ठीक थीं, लेकिन बहुत सारे लोगों को एंग्ज़ायटी होने लग गई है। आज तो छोटे-छोटे बच्चे कहते हैं हमको बहुत एंग्ज़ायटी हो रही है। उनको मतलब भी नहीं पता है एंग्ज़ायटी का, लेकिन अनकम्फर्टेबल लग रहा है। क्यों लग रहा है? क्योंकि हवा दूषित है। जैसे आप दिल्ली आएंगे तो लोगों को ऐसे ही खांसी होने लग जाती है। उनको कोई बीमारी नहीं है लेकिन हवा दूषित है। इसी तरह पिछले दो सालों में हम सृष्टि के वायब्रेशन को और नीचे ले गए हैं।

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