व्यक्ति हर पल उन बंधनों के साथ हमेशा जीता है जिन बंधनों का उसके जीवन में कोई उपयोग नहीं है। फिर भी वो उनके साथ रहकर पूरे जीवन को गुज़ारता है और उससे छूटना भी चाहता है। छूटने का भावार्थ यहाँ ये है कि हर पल व्यक्ति ये महसूस करता है कि शायद इसकी वजह से मैं दु:खी हूँ बहुत ज्य़ादा। और आपने कभी देखा होगा कि जितने भी बड़े-बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए उनकी जब आप कहानियां पढ़ते हैं, उनकी शहादत की बात पढ़ते हैं तो उनकी एक बात हमेशा ज़हन में आती है कि उन्होंने बिना परवाह किए सिर्फ एक लक्ष्य रखा कि हमें इस दुनिया में सभी को फ्रीडम देनी है ताकि सभी अपने हिसाब से जी सकें, खा सकें, पी सकें, रह सकें। वैसे हम सब भी स्वतंत्र हो गए देश के नाते कि हमारे देश पर किसी का बहुत बड़ा कब्जा था वो हट गया। लेकिन उसके बाद भी हम सभी अपने आप में खुश नज़र नहीं आते। उसका मात्र एक कारण है कि स्वतंत्रता एक बाहरी आवरण को हटा देने से नहीं आ जाती। लेकिन अन्दर से, देह से, देह के संबंधों से, देह के पदार्थों से, देह की बहुत सारी बातों से हम परतंत्र हैं। और हरपल उन बातों में जीवन हमारा जा रहा है। उसको चलाने के लिए दिन-रात आप मेहनत भी कर रहे हैं और सबके साथ जुड़ भी रहे हैं। जुडऩे के बावजूद भी हम सबके अन्दर उसका वो बल और उसका फल क्यों नहीं प्राप्त हो रहा है? कारण मात्र एक है कि स्वतंत्रता एक मन की दशा है, एक मन की स्थिति है, एक मनोदशा है। हम किसी चीज़ में खुद को बांधें तो परतंत्र हैं, और उससे निकल जायें तो स्वतंत्र हैं। ऐसे आपने कई बार देखा होगा कि जब किसी का शरीर छूट जाता है तो व्यक्ति का शरीर वहीं रह जाता है और जितने लोग वहाँ आस-पास बैठे होते हैं सब इस बात को आसानी से स्वीकार कर लेते हैं कि अब व्यक्ति ने शरीर छोड़ दिया है, आराम से शरीर छोड़ के चला गया है। उसको इस बात से कोई डिस्टर्बेंस, कोई परेशानी, कोई दर्द, कोई तकलीफ नहीं होती, वो आराम से निकल जाता है। जीवन के इन पहलुओं में भी ऐसा ही है। हम सभी हर एक कर्म को करके जितनी बार अपने आप को डिटैच करते हैं उतना हम उस चीज़ से स्वतंत्र फील करते हैं। हमें सिर्फ एक धारणा की ज़रूरत है और वो है इसका संज्ञान होना, इसका ज्ञान होना, इसकी समझ होना कि सारी स्थूल चीज़ों ने हमें नहीं बांधा है, हम इनके साथ बंधे हुए हैं। और जब इनके साथ बंधे हुए हैं तो उसी के आधार से हम कर्म भी करते हैं। अगर वो कर्म हमारे हिसाब से हो तो सुख मिलता है। लेकिन अगर किसी और के हिसाब से हो तो दु:ख मिलता है। लेकिन हमारे हिसाब से जो कर्म किया गया है वो ज़रूरी नहीं है वो बहुत अच्छा ही हो। क्योंकि हो सकता है कि आपको उसमें मज़ा आ रहा हो, लेकिन सबको अच्छा नहीं लगता। तो ऐसे ही हमें उन कर्मों को भी करना है जिन कर्मों से सबको सुख मिले और हमें भी सुख मिले। दूसरा हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना है कि मैं भी अच्छा फील करूँ और हर पल अच्छा फील करूं। लेकिन ये सारी बातें एक दिन की नहीं हैं। स्वतंत्रता हर पल खुद को खुद सारी चीज़ों से डिटैच करके,अलग करके याद दिलाने की शक्ति का नाम भी है। हम जितना स्वतंत्र हैं उतना शांत भी हैं। जितना स्वतंत्र हैं उतना शक्तिशाली भी, जितना स्वतंत्र हैं उतना मोहजीत हैं, जितना स्वतंत्र हैं उतना निर्मोही हैं, जितना स्वतंत्र हैं उतना पवित्र हैं। ये सारी बातों को हम क्रोस चेक कर सकते हैं। बार-बार देख सकते हैं कि मैं कहाँ-कहाँ अपने आपको परतंत्र महसूस करता हूँ। तो अन्दर की स्वतंत्रता एक बार हमने महसूस कर ली तो मैं बाहर रहते हुए, सबके साथ जीते हुए इन सारी बातों से डिटैच होकर अपना उस जीवन को फिर से पुन: अपना सकता हूँ जो बाहरी स्वतंत्रता के साथ-साथ अन्दर की स्वतंत्रता को भी फील कराये। तो इस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर क्यों न हम इस विधि को अपनायें कि अन्दर से संज्ञान को लें कि आत्मा इस शरीर से पहले से ही स्वतंत्र थी, अभी भी है लेकिन बस ज्ञान देकर, समझाकर उसको बार-बार याद दिलाकर इस बात को पक्का करना है कि आप स्वतंत्र आत्मा हो।
स्वतंत्रता के सही मायने
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