मुख पृष्ठलेखसाधना के पथ में त्याग का महत्त्व

साधना के पथ में त्याग का महत्त्व

साधना के मार्ग में त्याग का बहुत बड़ा महत्त्व है। त्याग से ही सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। त्याग ही हमें आत्मिक सुख व संतोष प्रदान करता है। जिन्होंने त्याग के महत्त्व को समझ लिया तो वह आत्मा शक्तिशाली व संतोष रूपी सुख अपनी झोली में डाल देते हैं।
आत्मिक तेज त्याग के प्रकाश से ही चमकता है। जो मस्तक से प्रतिबिंबित होता है। तेज आत्मा की पवित्रता व रूहानियत का प्रतिबिंब है। इसे दिव्य बुद्धि से ही समझा जा सकता है। तेज महापुरुषों की महानता व योगियों की दिव्यता है। आत्म जागृति का तेज, आत्मा के परमात्मा की समीपता का लक्षण है।

त्याग क्या है?
त्याग योगियों के जीवन सरिता की वह धारा, जिसमें अनेक आत्माएं स्नान करके निखर उठती हैं। त्याग के समक्ष अनेक मस्तक एक साथ झुक जाते हैं। त्याग अध्यात्म जीवन की वह कड़ी है जो रूह को उसके बच्चे प्रियतम से मिलाती है। त्याग नहीं तो मस्तक पर तेज भी नहीं। त्याग अति सूक्ष्म धारणा है। जिसे गुह्यता से समझे बिना नहीं अपनाया जा सकता।

त्याग माना ही
उन चीज़ों को छोड़ देना जो हमारे लक्ष्य पूर्ति में बाधा बनती हैं। अत: जिन्हें अध्यात्म के मार्ग में सर्वोच्च लक्ष्य को पाने का दृढ़ संकल्प है, उन्हें अति सहज भाव से त्यागवृत्ति को अपना लेना चाहिए। त्याग के क्षेत्र में हमारा इतना सहज स्वरूप हो जो हमें भी आभास न हो कि हम कुछ त्याग कर रहे हैं या हमने ये त्याग किया। यह महसूसता त्याग के बाद होने वाले सूक्ष्म तनाव का कारण है जो कि त्याग के बल को कम कर देती है।
हमारे त्याग का अर्थ सन्यास नहीं है। सन्यास में तो सबकुछ छोड़कर किनारा कर लिया जाता है। फिर वहाँ त्याग की वास्तव में आवश्यकता ही नहीं रहती। परन्तु हमें सबकुछ छोड़कर सन्यास तो नहीं लेना है। लेकिन हमें उससे भी महान पथ को अपनाना है। फिर सब कुछ रखते हुए भी सम्पूर्ण त्याग वृत्ति हो। परन्तु श्रीमत अनुसार कदम उठाने से यह पथ सरल हो जाता है क्योंकि सन्यास के बाद पुन: मन का खिंचाव होना संभव है त्याग के बाद नहीं।
अत: त्याग की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए कि – क्रहम मन में कुछ भी आसक्ति भाव से स्वीकार न करें।ञ्ज संसार में रहते हुए हमें अनेक वैभव प्राप्त होते हैं। परन्तु हम उनका उपभोग करते हुए उनमें आसक्त न हों बल्कि उनसे निर्लिप्त रहें।

हमारा जीवन त्याग की चैतन्य मूर्ति हो
हमारे जीवन से व चेहरे से दूसरों को त्याग दिखलायी पड़े। हमें यह कहने की भी आवश्यकता न हो कि हमने त्याग किया। त्याग के बाद उन सब पदार्थों से हमारा मन पूर्णतया उपराम हो चुका हो, तब ही हम दूसरों को त्याग की मूर्ति दिखाई देंगे। आसक्ति व लगाव हमें छूने से डरता हो, वैभव हमें दूर से ही नमस्कार करते हो, हमारा मन पूर्णतया संतुष्ट हो गया हो, उसका झुकाव चारों ओर से समाप्त हो गया हो- यह है त्याग की चैतन्य मूर्त। ऐसी मूर्तियों के सामने संसार के सभी वैभवशाली प्राणी, वैभवों के नीरसता का अनुभव करेंगे, भौतिकता में रंगे प्राणी स्वयं को प्रकृति का गुलाम महसूस करेंगे और प्रकृति ऐसे त्यागमूर्त आत्माओं की पूर्ण सहयोगी होगी।

त्याग, साधकों की कसौटी है
हम राजयोगी हैं इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हम बाह्य शालीनता का दिखावा करें। त्याग ही हमारी शालीनता है। त्याग ही हमारी ईश्वरीय प्राप्ति का प्रतिबिंब है। हम श्रेष्ठ आत्माओं के लिए अब ईश्वरीय अनुभूतियों के अतिरिक्त कुछ भी ग्रहण करने योग्य नहीं हैं। त्यागवृत्ति से ही योग की सूक्ष्मताओं का आभास होता है व आत्मा दिव्य अनुभवों से ओत-प्रोत होती है।

अहम भाव का त्याग
अनेक प्रकार के त्याग में अहम् भाव का त्याग सर्वोपरि व अति सूक्ष्म है। कई मनुष्य सम्पूर्ण त्याग करने के बाद भी मन के अहम को नहीं मार पाते, फलस्वरूप उनका त्याग सम्पूर्ण फलदायक नहीं रह जाता। क्योंकि अहम भाव विष तुल्य है, जो त्याग रूपी अमृत में मिलकर उसे भी जहरीला बना देता है। अत: हमारा त्याग व महानता पूर्ण निर्मल व निरहंकारी होने में है। साधकों का अहंकार, मनुष्यों के मन में योग के प्रति श्रद्धा को नष्ट कर देता है। अत: योगियों का चित्त पूर्ण रूपेण निर्मल हो, ताकि उनके बोल दूसरों पर सुखों की वर्षा करें। इस प्रकार त्याग को अपने जीवन का अविनाशी अंग बनाकर सादगी से जीवन का श्रृंगार करके, जब हमारे मस्तक के दिव्य तेज अविरल गति से प्रवाहित होगा तो उसकी चमक सारे जग को चमकायेगी। उसकी चमक सभी आत्माओं को ईश्वर की ओर प्रेरित करेगी। उसकी चमक के समक्ष पूर्णमासी का चांद भी साधारण लगेगा। ऐसे दिव्य तेज को मस्तक पर धारण करके, अब हमें शीघ्र ही इस धरा पर आये हुए सम्पूर्ण तेजोमय परमपिता को प्रत्यक्ष करना है।

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