मन की बातें

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प्रश्न : मैं शीला, मैसूर से हूँ। मेरा बेटा मानसिक रूप से इतना विकसित नहीं है। इसलिए पढ़ाई में जैसे दूसरे बच्चे अच्छे हैं, वैसा वो परफॉर्म नहीं कर पाता है। उसे मैं कैसे हैंडल करूँ और उसका भविष्य कैसा हो, उसके लिए क्या किया जाये? उत्तर : ये प्रश्न भी, ये समस्या भी कई परिवारों में है कि अगर चार बच्चे हैं तो दो बहुत इन्टेलिजेंट हैं तो एक ऐसा भी निकलता है जिसे थोड़ी कम बुद्धि है। तो मैं आपको यही कहूंगा कि आप थोड़ा-सा राजयोग सीखें। और थोड़ा सा समय दें उस बच्चे के लिए। उसके लिए तीन विधि बता देता हूँ, जिसका प्रयोग करने से आप बच्चे को मदद कर सकती हैं। अभी तो वो बच्चा है और उसे तो अभी जीवन की एक लम्बी यात्रा तय करनी है। बात केवल उसकी एजुकेशन की नहीं है, उसकी शादी होगी, वो अपना कुछ काम-धंधा करेगा, उसको अपना जीवन चलाना है। तो उसकी बुद्धि का विकास तो अच्छी तरह से होना ही चाहिए। तो आप एक काम करें कि जैसे ही सुबह उसे उठायें तो उसे कहें कि तीन बार बोलो मैं बुद्धिवान हूँ, मैं बुद्धिवान हूँ, मैं बुद्धिवान हूँ। बच्चा चाहे आँख मलते हुए बोले, पर धीरे-धीरे ऐसा कर दें कि बच्चा बिल्कुल कॉन्फिडेंस के साथ, बहुत अच्छी खुशी के साथ ये बोलने लगे कि मैं बुद्धिमान हूँ। तो सवेरे का टाइम ऐसा होता है कि उठते समय बच्चे का सबकॉन्शियस माइंड एक्टिव होता है। तो जैसे ही उसने ये संकल्प खुशी से किया कि मैं बुद्धिमान हूँ। तो सबकॉन्शियस माइंड ने इसे स्वीकार किया। और सबकॉन्शियस माइंड उसकी बुद्धि के लॉक खोलने लगेगा। तो ये काम सोने से पहले भी करा दें तीन बार और जगते हुए भी करा दें तीन बार। इसमें बहुत फायदा होगा, धीरे-धीरे बुद्धि का विकास होने लगेगा। एक दूसरा तरीका है, लेकिन इसके लिए राजयोग अवश्य सीखना होगा। ताकि आप अपने बच्चे को जब पानी पिलायें, दूध पिलायें, भोजन खिलायें, तो भोजन को दृष्टि देकर, पानी को दृष्टि देकर, दूध को दृष्टि देते हुए सात बार संकल्प करें कि मैं परम पवित्र आत्मा हूँ और फिर ये संकल्प कर दें कि इस पानी को पीने से, इस दूध को पीने से, इस बच्चे की बुद्धि का विकास हो, बिल्कुल दूध-पानी में ये वायब्रेशन समा जायेंगे और वो वही काम करेंगे जो आपने संकल्प दिया। ये बहुत बड़ी दवा हो जायेगी। तीसरी एक चीज़ मैं सिखाऊंगा। देखिए ये एक बहुत अच्छी थैरेपी है- हमें उस बच्चे के ब्रेन को हाथों से एनर्जी देनी है। अब उसका तरीका ये है कि अपने दोनों हाथ मलेंगे और तीन बार संकल्प करेंगे कि मैं परम पवित्र आत्मा हूँ, मैं परम पवित्र आत्मा हूँ, मैं परम पवित्र आत्मा हूँ। अब अपने हाथ को छोड़ दीजिए लूज़ और फिर देखो, फील करो एनर्जी, अट्रैक्शन। ये एनर्जी आ गई हाथों में। जो संकल्प हमने किया था ना कि मैं परम पवित्र आत्मा हूँ, वो पवित्र एनर्जी हाथों से निकलने लगेगी। फिर अपने ये दोनों हाथ बच्चे के सिर पर रख दें। बच्चा आँखें बंद करके रखे और आप एक मिनट तक अपना हाथ उसके सर पर रख कर रखें। ये प्योर एनर्जी ब्रेन को जायेगी और संकल्प करें कि ये एनर्जी इसके ब्रेन का विकास करे। ऐसा पाँच बार कर दें। पाँच बार सुबह कर दें और पाँच बार रात को कर दें। तो प्योर एनर्जी जाने से ब्रेन के कई ब्लॉकेज खुल जायेंगे और ब्रेन का विकास हो जायेगा। तो ये तीन विधि अपनायेंगे तो निश्चित ही ये समस्या समाप्त जायेगी।

प्रश्न : मेरा नाम रमेश अग्रवाल है, मैं मऊ से हूँ। हम दोनों पति-पत्नी काम काजी हैं। मैं बैंक में हूँ और मेरी पत्नी टीचर है। दोनों ज्य़ादा समय घर से बाहर रहते हैं इसलिए बच्चों को ज्य़ादा समय नहीं दे पाते। हमें भी ये बात खटकती है लेकिन हम भी मजबूर हैं। तो इस समस्या का क्या समाधान हो सकता है? उत्तर : इस बारे में मैं ये बात कहूंगा कि बच्चे भी सवेरे उठकर स्कूल चले जाते हैं तो वो तो सात बजे ही चले जायेंगे और आप लोग तो 9-9:30 बजे जायेंगे लेकिन या तो कुछ ऐसा कर लें कि जो माता जी हैं या तो वो थोड़ा पार्ट टाइम जॉब कर लें क्योंकि बच्चों को समय देना तो बहुत आवश्यक है। और अगर ऐसा नहीं हो सकता तो अपने घर में रोज़ शाम को एक बार फैमिली कॉन्फ्रेंस अवश्य करें। सब आपस में बैठें, मिलें, भोजन का समय है, सब एक साथ बैठकर खायें। एक-दूसरे का हाल-चाल पूछें, माँ-बाप उनकी तबियत का, उनकी पढ़ाई का, उनके फ्रेंड्स का, उनका सब हाल चाल, तो उनके साथ आधा घंटा या एक घंटा ऐसा व्यतीत करें कि उनको ऐसा लगे कि बहुत अच्छा हो गया, फैमिली लाइफ की उनको फीलिंग होने लगे। नहीं तो क्या होगा, माँ-बाप भी आये थके-थकाये, बहन जी ने खाना बनाया, बच्चों ने होमवर्क किया, खाये पीये और सो गए। इससे बच्चों के चरित्र पर बहुत बुरा असर पड़ता है। और जब छुट्टी हो तो छुट्टी वाले दिन काम से टाइम निकालके फैमिली लाइफ को एन्जॉय करने का एक प्रोग्राम बनाना चाहिए। और साल में दो बार ऐसे अपने बच्चों को आउटिंग पर भी ले जाना चाहिए। तीन दिन की, पाँच दिन की छुट्टी लेकर ताकि मनोरंजन हो जाये, पिकनिक हो जाये। ताकि बच्चों को एक फैमिलियर फीलिंग हो, उन्हें न्यारा-न्यारापन न लगे। क्योंकि आज वेस्टर्न कल्चर की तरह भारत में भी सारे कामकाजी हो गए हैं। तो ऐसे मैनेज करने से सब अच्छा हो जायेगा।

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