मुख पृष्ठआजादी के अमृत महोत्सव से स्वर्णिम भारत की ओरआत्मा दशरथी उसके चार पुत्र पुरुषार्थी

आत्मा दशरथी उसके चार पुत्र पुरुषार्थी

बाबा ने आकर ये बेहद का यज्ञ किया और इस यज्ञ के फलस्वरूप चार बेटे हरेक को दिये। हरेक ब्राह्मण को चार बेटे मिले। जिसकी परवरिश और पल्लिवत कर परफेक्ट बनने की दिशा में आगे बढऩा है। ना रूकना है न थकना। 

जैसा कि पिछले अंक में हमने जाना कि माया क्या और रावण क्या। और दूसरा दशरथ क्या और उनकी जो तीन साथियां थीं उनका सही मायने में अर्थ क्या। अब हम आगे जानते हैं…
धीरे-धीरे जैसे ही सतयुग-त्रेतायुग पूरा होकर के द्वापर में भी तीन हिस्सा सुख मिला, लेकिन चौथे कलियुग के अन्दर कहीं न कहीं, कुछ-न-कुछ युद्ध शुरू हुआ जीवन के अन्दर भी। और उन युद्धों के कारण कहा कि घर में शान्ति बनी रहे, तो उसके लिए यज्ञ किया। और उस यज्ञ से जो फल माना ”संगमयुग” आ जाता है, बाबा ने आकर ये बेहद का यज्ञ किया और इस यज्ञ के फलस्वरूप चार बेटे हरेक को दिये। हरेक ब्राह्मण को चार बेटे मिले। जिसकी परवरिश हमें निरन्तर करनी है। तो ये चार बेटे कौन-से हैं?
पहला है ”श्री राम” अर्थात् ज्ञान। ज्ञानी तू आत्मा। दूसरा, ”भरत” माना ”समर्पण भाव”। योग माना ही ईश्वर के प्रति”समर्पण भाव”। तीसरा, लक्ष्मण माना जिसका लक्ष्य मन का इतना स्पष्ट और अविचलित, और ये लक्ष्य इसीलिए था क्योंकि ”त्याग” की शक्ति थी। लक्ष्मण ने जैसा ”त्याग” किया वैसा त्याग किसी का नहीं दिखाते, राम का भी नहीं दिखाते हैं, ऐसा त्याग किया। अर्थात् जो धारणामूर्त आत्मा है। और चौथा, ”शत्रुघ्न”। जो सबकी सेवा करता है। सारी माताओं की भी सेवा करता है, सबकी सेवा करने वाला सेवाधारी। तो ब्राह्मण जीवन के ये चार आधार — ”ज्ञान”, ”योग”, ”धारणा” और ”सेवा” ये चार बेटे हैं, जिसकी परवरिश हमें निरन्तर करते रहना है। जिसको मजबूत बनाना है। क्योंकि यही जीवन का आधार है। उसको मजबूत करने के लिए उन्हें गुरुकुल में भेजा गया, शिक्षा-दीक्षा लेने के लिए। अर्थात् ये ब्राह्मण जीवन में भी इन चारों सब्जेक्ट को मजबूत करने के लिए रोज़ पढ़ाई पढऩा अनिवार्य है। तभी बाबा कहते हैं — मुरली कभी मिस नहीं करना है। क्योंकि मुरली से ही, शिक्षा से ही, ये चारों,जीवन के आधार को हम परिपक्व कर देेते हैं, मजबूत कर देते हैं। ताकि जीवन में कोई भी प्रकार की माया आई, या रावण भी आ जाये, तो भी हमें हरा नहीं सकता है। इसलिए ये चारों सब्जेक्ट को मजबूत करना बहुत आवश्यक है। क्योंकि नहीं तो माया तो आती ही रहेगी।
इसीलिए सबसे पहली माया जो दिखाई, वो थी ”ताड़का”। और वो माया क्या करती है? तो बताया जो ऋषि यज्ञ करते थे उसमें विघ्न डालते थे, हड्डियाँ डालते थे, भावार्थ यह है कि जो आत्माएँ तपस्या कर रही थीं ब्राह्मण जीवन में, उसके जीवन में ”विघ्न” डालने का काम ये माया करती है। तब इस माया को भी जीतने के लिए ”राम और लक्ष्मण” दोनों मिल कर जीतते हैं। भावार्थ यह है कि जब यह विघ्न आता है, उस समय योग करने के लिए कहा जाए, योग नहीं लगता है। लेकिन उस समय ”ज्ञान का प्रैक्टिकल एप्लीकेशन” और ”धारणा” ही हमारे हर विघ्न को पार करने के लिए हमें सक्षम बना देती है, पॉवरफुल बना देती है। धारणा को कसने की आवश्यकता है। क्योंकि ये ताड़का कहाँ से आती है जहाँ कहीं हमारी धारणाओं में हम लूज़ हैं, कमज़ोर हैं। चलता है, होता है, जहाँ इस तरह की भावना रखी तो कोई-न-कोई माया विघ्न डालने का काम ज़रूर करती है। इसीलिए ”ज्ञान” और ”धारणा” को पॉवरफुल करो। ज्ञान का एप्लीकेशन बाबा ने हर बात का एप्लीकेशन हमें दिया हुआ है। कहाँ ड्रामा की प्वाइंट को एप्लाई करो, कहाँ कर्म फिलॉसफी को एप्लाई करना है, तो कहाँ इन परीक्षाओं को समझते कौन-सी ज्ञान की प्वाइंट, फुल स्टॉप लगाना है या वाह-वाह के गीत गाने हैं, ये सारे ज्ञान के जो विभिन्न शस्त्र हैं, इन शस्त्रों को यूज़ करना है और उस ताड़का को खत्म करना है। ”धारणा”को पॉवरफुल कर देना है तो ”ताड़का” समाप्त होगी।
फिर जैसे-जैसे आगे बढ़े तो कहा जाता है कि सीता के साथ का वरण हुआ। शिव धनुष को उठाया। ज्ञानी-तू-आत्मा शिव धनुष उठाती है मतलब शिव धनुष कौन-सा है? शिव धनुष है — ”ब्रह्मचर्य व्रत की पालना का धनुष”। इसीलिए जो अहंकारी व कमज़ोर होते हैं वो इस धनुष को नहीं उठा सकते, लेकिन जो ”ज्ञानी-तू-आत्मा” जिसने अपने जीवन के अन्दर ब्रह्मचर्य व्रत की पालना की, जो बहुत आवश्यक है ब्राह्मण जीवन में, वो इस धनुष को सहज उठा सकते हैं और जब धनुष को उठाते हैं तब सीता के साथ का वरण होता है। अर्थात् सीता माना ”पवित्रता की प्रतिमूर्ति”। ब्रह्मचर्य व्रत के लिए बहुत सारी बातें आयेंगी जीवन के अन्दर। परशुराम भी पहुँच जायेगा कि कैसे उठा लिया तुमने इस धनुष को?
कई प्रकार की महान बातें भी आपके सामने आयेंगी लेकिन जिसने इस ”शिव-धनुष” यानी प्रतिज्ञा को जीवन के अन्दर मजबूत कर लिया, वही ”सीता” के साथ यानी ”पवित्रता” के साथ ज्ञान का वरण होता है। और जब ज्ञान का वरण ”पवित्रता” के साथ हो जाये तो वह आत्मा बहुत मजबूत हो जाती है। उसपर कोई भी ”माया” या कोई भी ”रावण” जीत प्राप्त नहीं कर सकते।

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