मुख पृष्ठआजादी के अमृत महोत्सव से स्वर्णिम भारत की ओरविश्वामित्र क्या हमारी कहानी नहीं है!

विश्वामित्र क्या हमारी कहानी नहीं है!

तुलसीदास कृत रामचरितमानस एवं वाल्मीकि कृत रामायण में एक चरित्र बड़ा ही प्रचलित है, जिसको विश्वामित्र नाम देते हैं और विश्वामित्र का जो सबसे बड़ा योगदान है, वो ये है कि वे ऋषि, मुनि, तपस्वियों के तप में, यज्ञ में विघ्न डालने वालों से बचाने के लिए श्री राम और श्री लक्ष्मण को वन में ले आये और उनके द्वारा उन्होंने उसका निवारण किया। अब क्या इस चीज़ को हम अपने दैनिक जीवन में नहीं अपना सकते! अपनाना है इसको लेकिन समझ के। अब आप देखो, राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चार भाई थे लेकिन विश्वामित्र जी ने सिर्फ दो को ही चुना, श्री राम और श्री लक्ष्मण। अब हम रामायण में नहीं चले जायेंगे कि उस समय वो दोनों ननिहाल गये थे या कहीं और थे। इसमें हमें नहीं जाना है। हमें ये देखना है कि उन्होंने श्री राम और श्री लक्ष्मण को दशरथ जी से ये कहकर लिया कि मैं इन्हें वन में लेकर जा रहा हूँ ऋषि-मुनियों के विघ्न को खत्म करने के लिए। तो इसमें मर्म ये है कि आत्मा को राम(आत्मा राम) भी कहा जाता है। और आत्मा राम जब अपने लक्ष्य पर पूरी तरह केंद्रित हो जाती है तो उसको लेने के लिए विश्वामित्र आते हैं अर्थात् वो पूरे विश्व का मित्र बन जाता है।
आज पूरे साम्राज्य, पूरे संसार में हर तरफ एक चीज़ का बोलबाला है, वो ये कि कोई किसी को स्वीकार करने को राज़ी नहीं है, सब अपने आप को श्रेष्ठ और दूसरे को निकृष्ट समझ कर ही चलते हैं। ऐसे समय में सभी लोग हमारे नज़दीक कब आयेंगे जब हमारे अंदर श्री राम की तरह धारणा या भावना हो। सबके लिए समान भाव, एक भाव। सब उस एक परमात्मा की संतान हैं, सब एक हैं। और सबके अंदर सिर्फ यही एक भाव रहे कि सभी को जीवन श्रेष्ठता के लिए मिला है, सभी को साथ लेकर चलने के लिए मिला है, अकेले रहने के लिए नहीं मिला है। जब ये भाव आयेगा तब जीवन में अनेकानेक बदलाव स्वत: आने लग जायेंगे।
इस विश्व में सबसे ज्य़ादा हमें दुआओं की आवश्यकता है। क्यों आवश्यकता है, क्योंकि जीवन को आपने देखा होगा कि कितना उलझा हुआ है आज। हमारे पास सारी सुख-सुविधाएं हैं, सबकुछ है, फिर भी हम स्वयं को असुरक्षित और भ्रमित महसूस कर रहे हैं। क्यों ऐसा है, क्योंकि हम सबको अपना नहीं मानते। सबके लिए समान भाव नहीं रखते, सबको एक साथ लेकर नहीं चलते। क्या राम कथा को या राम के चरित्र को अपने जीवन के साथ जोड़कर कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि हम भी सभी के लिए सोचें! अब ऐसा हुआ या नहीं हुआ लेकिन उसे हम अपने जीवन में अगर उतारते हैं तो हम ज़रूर पूरे विश्व के मित्र बन जायेंगे अर्थात् हमारे चलने से, बोलने से, देखने से सबका उद्धार होने लग जायेगा, सबको कुछ प्राप्ति होने लग जायेगी। जैसे रामायण में दिखाते हैं कि राम, लक्ष्मण जिस रास्ते से गुज़र रहे थे, वहां की धरती, वहां का वातावरण, वहां के राक्षस, वहां के पत्थर सबमें परिवर्तन आता जा रहा था। लेकिन वो परिवर्तन तब आयेगा जब हम अपनी आत्मा के अंदर वो सारे गुण और विशेषताएं लेकर आयेंगे। तब विश्वामित्र बनेंगे माना राजा भी बनेंगे, ऋषि भी बनेंगे, सबके साथ रहेंगे और तपस्वी रूप से रहेंगे। तो ये जो चरित्र और चित्र बने इस दुनिया में, तो उसे चरितार्थ करने से ही हम उस चरित्र और चित्र के साथ न्याय कर सकेंगे और जीवन को आगे बढ़ा सकेंगे। तभी सभी हमें स्वीकार करेंगे और हम सभी को स्वीकार करेंगे। तो चलो, हम सभी बन जाते हैं अब विश्वामित्र।

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