जैसा निश्चय, वैसा होगा स्वरूप…

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जैसा आप अपने को देखोगे या अपने बारे में समझोगे, जैसा दृश्य या रूप बनाओगे वही आपका दर्शन है, जीवन दर्शन है, फिलॉसफी है। फिलॉसफी को भी दर्शन कहते हैं। आप अपने को कैसे देखते हैं- यही आपका जीवनदर्शन है

विदेही बनने के लिए हमेशा यह सोचो कि मैं फरिश्ता हूँ। चलते-फिरते, उठते-बैठते इसी चाल से चलो। आप जानते होंगे, शेर कैसे चलता है, बिल्ली कैसे चलती है और चूहा कैसी चाल चलता है। हरेक पशु की चाल उसके निश्चय के मुताबिक है। चूहा ऐसा क्यों चलता है? क्योंकि उसका निश्चय ही ऐसा है। उसको पता है कि आदमी मुझे पकडऩे आयेगा, मुझे बिल में घुस जाना है। जायेगा फटाफट-फटाफट, देखेगा इधर-उधर, कोई आ तो नहीं रहा है पीछे से। जहाँ देखेगा बिल, उसमें घुस जायेगा। उसकी चाल-ढाल सब ऐसी है। क्योंकि उसके मन में रहेगा कि मैं पकड़ा जाऊंगा, मुझे पकडऩे वाले लोग बहुत हैं। मुझे छिपके ही काम करना है। उसकी चाल उस तरह से होती है। हाथी की चाल मस्त है, वह समझता है कि मैं तो बड़ा शक्तिशाली हूँ। मेरा कोई क्या कर सकता है! देखिये वह कैसे चलता है। ऊँट को देखिये, उसकी चाल अलग है। हरेक पशु की चाल अलग-अलग है। किसी ने कहा कि व्यक्ति को पहचानना है तो उसकी गुुफ्तार(बोलचाल), रफ्तार(चलने का ढंग) और दस्तार(पगड़ी) देखो। इन तीन चीज़ों से व्यक्ति को पहचान सकते हैं। इसी प्रकार से, हरेक व्यक्ति का जो निश्चय है कि मैं फरिश्ता हूँ, मैं फरिश्ता हूँ, मैं फरिश्ता हूँ, उसके आधार पर उसकी स्थिति बनती है। एक पूरा दिन आप ”मैं फरिश्ता हूँ” यह सोचकर देखो, आप उडऩे लगेंगे। अगर एक पूरा दिन आपने सोचा कि मैं मोटा आदमी हूँ, मैं भारी आदमी हूँ, उस दिन की अपनी अवस्था भी देख लो। आपको बहुत भारी देह-अभिमान होगा। यह एक स्मृति है, जागृति है कि मैं फरिश्ता हूँ। इसी को बाबा कहते हैं कि लाइट के कार्ब में अपने आपको समझो। अपने को उस स्वरूप(लाइट के कार्ब) में देखो या तो योगी के स्वरूप में देखो कि कमल आसन पर बैठ परमात्मा से मिलन की लगन में मगन हूँ, परमात्मा की याद का आनन्द ले रहा हूँ। उसमें तल्लीन हूँ- इस स्वरूप में देखो। जैसा आप अपने को देखोगे या अपने बारे में समझोगे, जैसा दृश्य या रूप बनाओगे वही आपका दर्शन है, जीवन दर्शन है, फिलॉसफी है। फिलॉसफी को भी दर्शन कहते हैं। आप अपने को कैसे देखते हैं- यही आपका जीवनदर्शन है। बाबा कहते हैं कि आप अपने को यह समझो कि मैं फरिश्ता हूँ, जिससे आपको याद आयेगा कि फरिश्ता किसको कहते हैं, फरिश्ता क्या काम करता है, फरिश्ता क्या नहीं करता। दूसरा है, मैं लाइट हूँ, मैं माइट हूँ। अपने को बार-बार स्मृति दिलाओ कि मैं लाइट हूँ, मैं माइट हूँ। इससे ही हमारी विदेही अवस्था, लाइट और माइट की अवस्था होगी।
तीसरा है, विकर्म विनाशक अवस्था। इसके लिए बाबा ने कहा है कि तपस्या करो। हमारे ऊपर 63 जन्मों के विकर्मों का बोझ है। इसलिए बाबा कहता है कि विकर्म विनाशक अवस्था को धारण कर विकर्मों को भस्म करो। बच्चे, इसके लिए ओना होना चाहिए, फुरना होना चाहिए। बाबा कहते हैं कि तपस्या करो, तपस्वी कुमार बनो। साधन नहीं, साधना करो। ज्य़ादा साधन इकट्ठे करने की कोशिश मत करो। साधना के ऊपर ध्यान दो। सिद्धि जो होगी साधनों से नहीं होगी, साधना से होगी। बाबा कहते हैं कि इस अवस्था को पाने के लिए किसी भी वस्तु, व्यक्ति और वैभव से लगाव न हो, झुकाव न हो। फरिश्ते बनने के लिए, विदेही बनने के लिए ये लगाव और झुकाव ज़ंजीरें हैं। ये उडऩे नहीं देंगे, ये बाधा हैं। चौथी बात है, अपने को समझें कि मैं पॉवर हाउस हूँ। दूसरों को भी लाइट और माइट देने वाला हूँ। मेरे नेत्र जो भी देखें, मेरी वाणी जो भी सुनें, मेरे सम्बन्ध-सम्पर्क में जो भी आयें, उनको शक्ति, करेंट मिलना शुरू हो जाये।
पांचवी बात है, एक बाप दूसरा न कोई। इस अवस्था से ही हमारे में सत्यता की शक्ति आयेगी। बाप सत्य है, उस एक के बनके रहने से ही हमारे में वह शक्ति आयेगी। एक बाप दूसरा न कोई, इससे हमारी विकर्म विनाशक अवस्था होगी। जब तक हमारा जीवन इस पर नहीं टिका है, वह विकर्म विनाशक अवस्था नहीं होगी। हल्के-सल्के अनुभव होंगे लेकिन शक्तिशाली अवस्था, शक्तिशाली अनुभव नहीं होंगे।

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