मुख पृष्ठदादी जीदादी जानकी जीजैसा संकल्प, वैसी वाणी, वैसा कर्म

जैसा संकल्प, वैसी वाणी, वैसा कर्म

संगमयुग पर कमाई करते-करते बहुत बड़ी हो जाती है। आज के ज़माने में धन की कमाई बड़ी मेहनत से करते हैं। बहुत कमाने वाले सारा दिन सोचते हैं लेकिन अभी बाबा ऐसी कमाई कराते हैं जो सोचना बन्द। सोचेंगे तो नुकसान पड़ जायेगा, नहीं सोचेंगे, विश्वास और सच्चाई से काम करेंगे तो फायदा ही फायदा है। सोचने की बात ही नहीं है। शान्ति और प्रेम में कमाई ऐसी हो रही है, उसमें खुशी भी आ रही है। फिर जी चाहता है जैसे मेरी कमाई हो रही है, वैसे संगठन की भी कमाई हो जाये। इस पढ़ाई में ही कमाई है। उस पढ़ाई में पहले पढ़ते हैं फिर कमाई होती है। उसमें टाइम भी खर्च करते हैं, मनी भी खर्च करते हैं, लेकिन अभी बाबा जो हमको पढ़ाता है इसमें कमाई ही कमाई है। पढ़ाई जितना अच्छी पढ़ते हैं तो लगता है कि मेरी जीवन बहुत सुखी है। कोई फिकर की बात ही नहीं है। भविष्य के लिए जमा हो रहा है। जिस दिन पढ़ाई ठीक से नहीं पढ़ते हैं तो खुशी नहीं रहती है। इस पढ़ाई से न केवल खुशी, शक्ति आ रही है लेकिन उस शक्ति से हम हंस बन गये हैं। श्रेष्ठ कर्मों का खाता जमा हो रहा है, व्यर्थ खत्म हो गया। जैसा संकल्प, वैसी वाणी, वैसा कर्म।
तो संकल्प को समझना, समझ के संकल्प को पैदा करना, आपेही संकल्प न चलें, निकम्मे संकल्प न चलें। काम लायक संकल्प आयें, जिससे औरों को भी फायदा हो, मेरे को भी फायदा हो क्योंकि औरों को मिला सो मेरे को
मिला। पढ़ाई में कमाई दोनों काम हो रहे हैं। जो खुद के मनन चिन्तन में है, उसके मुख में ज्ञान का सार स्पष्ट रूप में आ जायेगा। वह सार है मनमनाभव। कितना मेरा मन अच्छा हो गया!
बुद्धि को भगवान कहता है, मध्याजीभव। मनमनाभव में कर्मेन्द्रियां शान्त हो गयी फिर मध्याजीभव में चार बाहें आ गई। स्वदर्शनचक्र, ज्ञान-योग की प्रकाष्ठा आ गयी, विष्णु को कमल के फूल पर खड़ा हुआ दिखाते हैं। योगी कमल पुष्प पर बैठा हुआ दिखाते हैं। कमल आसन पर न्यारा होकर बैठा है। कईयों को समझ में ही नहीं आता है, बुद्धि से समझा है, पर अनुभव नहीं होता है, डिटैच और न्यारा कैसे हो।
अटैचमेंट का अनुभव बहुत है, कितना समय लगा है बाबा का बनने में। कितना दु:ख दिया है फिर भी छोड़ते नहीं हैं। फ्री होते हैं तो डर लगता है, अकेलापन लगता है।
आदत है किसी को पकड़कर चलने की, नहीं तो बेसहारा है। जवानों को भी होता है, तो बूढ़ों को भी होता है, क्योंकि शरीर से अटैचमेंट बहुत है। बाबा न्यारापन सिखाता है। न्यारा रहने से योग अच्छा लगता है। तो कमलपुष्प समान प्युरिटी, ज़रा छींटें भी नहीं, इतना न्यारा है तो आसन पर बैठा है।

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