मुख पृष्ठलेखबस ये दो शब्द… राजयोगिनी ब्र.कु.जयंती दीदी,अतिरिक्त मुख्य प्रशासिका,ब्रह्माकुमारीज़

बस ये दो शब्द… राजयोगिनी ब्र.कु.जयंती दीदी,अतिरिक्त मुख्य प्रशासिका,ब्रह्माकुमारीज़

मिसअंडरस्टैंडिंग तब होती जब बोलने वाले के भी स्पष्ट भाव नहीं हैं, उसके मन में भी कुछ दुविधा चल रही है। और जो सुनने वाला है वो तो फिर क्या लेगा। वो भी मिक्सड मैसेज लेगा। ये भी हो सकता है, वो भी हो सकता है। पूरा उन्हों के सामने भी स्पष्ट नहीं होगा

ईयों ने तो दादी गुल्ज़ार को भी नहीं देखा तो दादी प्रकाशमणि या मम्मा की तो बहुत पीछे के इतिहास की बात हो गई। परन्तु आप समझ सकती हैं और आजकल तो वीडियो द्वारा कितनी बातें सब तरफ पहुंच जाती हैं। मुझे याद आता है कि किसी ने मुझे कहा कि मैं चाहती थी कि मम्मा को मैं ज्य़ादा जानूं, तो मैं सोचती थी कि मैं कैसे जान सकती हूँ! तो फिर उसने खोज की और अपनी खोज से उसको मम्मा की कुछ बुक्स का पता चला और मम्मा की वाणी की बहुत सारी बातें मिलीं, तो कुछ सप्ताह के बाद उसने कहा कि अभी मुझे लगता है कि मैं मम्मा को अच्छी तरह से जानती हूँ। और हाँ मैं मम्मा को उस कदम में फॉलो कर सकती हूँ।
तो आज का टेक्नोलॉजी का साधन ऐसे है जो बेशक हम फिजि़कल हिसाब से इन दादियों से न भी मिले हों, जो मिले हैं उन्हों का तो सौभाग्य। जो न मिले हैं वो ये नहीं कह सकते कि हम उन्हों को जानते नहीं। जैसे शिव बाबा को इन आँखों से तो नहीं देख सकते परंतु बुद्धि से तो जान सकते हैं। इसी तरह से जिन्होंने इतने यज्ञ की स्थापना के कार्य में मदद की, सेवायें की, जो इतना फाउंडेशन मजबूत चल रहा है और वृद्धि को प्राप्त करते जा रहे हैं। उन्हों की भी आप बिल्कुल थोड़ा-सा खोज करेंगे तो आपको बहुत कुछ उसकी जानकारी मिलेगी। और आप उन्हों को अपने आँखों के सामने देखेंगे, जैसे फरिश्ते घूम रहे हैं और आपको उन्हों के द्वारा वो प्राप्ति हो सकेगी।
तो मैं इस कारण से आपको वो एग्ज़ाम्पल्स दे रही हूँ, जो बेशक अभी आँखों के सामने नहीं हैं परन्तु फरिश्ते रूप में तो अवश्य ही हम सबके सामने हैं। तो कम बोलना और धीरे बोलना। आपने सोचा होगा कभी हाई गवर्नमेंट ऑफिसर्स होते हैं या कोई रॉयल फैमिली का होता है कलियुग के अन्त में भी तो वो ऊंचे आवाज़ से नहीं बोलते। वो अपने बहुत शांति की आवाज़ से बात करते हैं। कई आपसे मिले भी होंगे, कई आपने टेलिविज़न पर देखा भी होगा। तो दादियों का भी कभी किसको बड़े आवाज़ से पुकारे यहाँ आओ, नहीं। इशारे से। उन्हों का कम बोलना, धीरे बोलना ऐसे था कि बहुत कुछ इशारों से ही चलता था। और दादियों को वो भी पसंद होता था कि उन्हों के आजू-बाजू में सेवा करने वाले हैं वो भी दादियों के इशारे को समझ कर बात करें। नहीं तो ये भी सोच सकते हैं कि परन्तु दादी ने मुझे कहा थोड़े ही। दादी कहेंगी, कोई भी दादी, दादी कहेंगी क्या आपने मेरे इशारे को नहीं समझा! कहने की बात तो थी ही नहीं। आप मुझे जानते हो। आप इशारों से समझ सकते थे। तो वो बहन ज़रूर ऐसे कहेगी जी दादी। हाँ, सॉरी।
कम बोलने की एक आदत होती है। जो डालनी होती है। कई कहते हैं कि मेरा आवाज़ ही बहुत बड़ा है। परन्तु बड़े आवाज़ को भी नॉर्मल रूप से बात करना या बड़े आवाज़ को बहुत ऊंचे रूप से बात करना वो भी अपने हाथ की ही बात होती। तो धीरे बोलना ये भी बहुत ही आवश्यक बात है। और ऐसे अपना माइंड क्लीयर हो जो हम थोड़े शब्दों में धीरे बोलने से अपने भाव को स्पष्ट किसके सामने करें। आप सोचो कि मिसअंडरस्टैंडिंग कब होती है। मिसअंडरस्टैंडिंग तब होती जब बोलने वाले के भी स्पष्ट भाव नहीं हैं, उसके मन में भी कुछ दुविधा चल रही है। और जो सुनने वाला है वो तो फिर क्या लेगा। वो भी मिक्सड मैसेज लेगा। ये भी हो सकता है, वो भी हो सकता है। पूरा उन्हों के सामने भी स्पष्ट नहीं होगा।
तो ये दो बातें पहले, फिर मीठा बोलना, ऊपर-ऊपर से मीठा बोलने का भाव नहीं निकलता। वो भी लोग आजकल समझ ही जाते हैं कि ये तो ऊपर-ऊपर से ही बात कर रही है या रहा है। उन्हों के तो मन के भाव अलग हैं और शब्दों का भाव अलग है। हरेक को ये फीलिंग आती है। परन्तु जब हम ये मंत्र याद करते कि मीठा बोलना है उसका मतलब ये है कि आत्मा ने अपने अन्दर की इतनी सफाई की हुई हो जो बाबा कहते थे कि पवित्रता की स्टेज वो हो जो व्यर्थ कुछ भी न आये। न संकल्प में और न स्वप्न में।

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