अपने बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान करें

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यह कहानी है हिमाचल प्रदेश के पांगी नामक जगह की। बहुत पुरानी बात है पांगी के एक गांव में यह प्रथा थी कि वह अपने बुज़ुर्गों को घर पर नहीं रखते थे। पूरे गांव वालों को इस प्रथा और रिवाज़ों का पालन करना पड़ता था। जैसे ही उनके घर के बड़े बुज़ुर्ग हो जाएं तो उन्हें किलटा बास्केट में उठाकर दूर पहाड़ी पर छोड़ दिया जाता था। इसी तरह यह प्रथा चलती रही। एक समय आया एक दिन हरि राम नामक आदमी अपने पिता वृषभ सिंह को छोडऩे जा रहा था। हरि राम अपने छोटे बेटे चिंटू के साथ अपने पिता को किल्टे में रख पीठ पर उठाकर उस दूर पहाड़ी की यात्रा करने लगा। जब वह दूर पहाड़ी में पहुंचे तो वह अपने पिता को वहाँ छोड़कर वापस घर चल दिया। वह छोटा बच्चा चिंटू अपने दादा से बहुत प्यार करता था। जब वह वापस आ ही रहे थे तो चिंटू ने अपने पिता हरि राम से कहा पिता जी आप उस किल्टे को वापस लेकर आइए। हम तो किल्टा पहाड़ी पर ही भूल आए। चिंटू के पिता हरि राम ने बहुत ही हैरानी से उसे पूछा कि किल्टा वापस क्यों लाएं? उसकी क्या ज़रूरत, तो चिंटू ने अपने पिता से कहा कि जब आप बूढ़े हो जाओगे तो आपको भी तो किल्टे की ज़रूरत पड़ेगी ना! मैं इतनी दूर पहाड़ी में आपको कैसे लेकर आऊंगा। जब आप बूढ़े हो जाओगे आप तो चल भी नहीं पाओगे। उस समय किल्टा ही तो आपके काम आयेगा ना! उसकी यह बात सुन हरि राम का सिर चकरा गया, उसे अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। यह बात उसके दिल में चुभी। उसे यह एहसास हुआ कि उसने अपने पिता के साथ बहुत गलत किया है। पर यह तो उस गांव का रिवाज़ था। अब उसने उस रिवाज़ से अलग करने की सोची। वह चुपके से अपने पिता को उसी किल्टे में रखकर वापस घर ले आया और घर पर उसने एक कमरे में अपने पिता को छुपा कर रखा ताकि कोई उसे देख ना लें। क्योंकि यह गांव की प्रथा थी कि कोई भी बुज़ुर्ग घर पर ना रहे। अब दिन बीतते गए वह अपने पिता से बेहद प्यार करने लगा। अब कभी भी गाँव में पंचायत चर्चा चल रही हो, अन्य कोई भी फैसला लेना हो तो हरि राम के पिता उसे बहुत अच्छी सलाह दिया करते थे और वह हमेशा अपने पिता की बातों को मानकर अपने जीवन में बहुत तरक्की करने लगा। जब भी गाँव में कोई चर्चा होती तो उसमें वह बड़ी-बड़ी समस्याओं का समझदारी से तर्क-वितर्क करता। समझदारी की बातें किया करता। जब लोग हरि राम से पूछा करते तुम ऐसी समझदारी की बातें कहाँ से लाते हो इतनी छोटी-सी उम्र में? तो वह मन ही मन मुस्कुराता और अपने पिता का धन्यवाद करता। क्योंकि वह समझदारी की बातें उसे तो केवल उसके पिता ही सीखा सकते थे। अगर वे उन्हें वापस ना लाते तो यह बातें और जीवन की यह महत्त्वपूर्ण सीख उसे कौन देता और जीवन में होने वाली गलतियों से कौन सर्तक करता और बचाता। तो उसने गाँव वालों से यह कहा कि अगर हम अपने बुज़ुर्गों को घर से बाहर छोड़ आते हैं तो हम अपने जीवन में तरक्की नहीं कर सकते। हम अपने जीवन में गलत फैसले लेने से नहीं बच सकते। यह हमें हमारे जीवन में भारी नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। तो इसीलिए कोई भी कार्य करने से पहले अपने बड़े-बुज़ुर्गों का आशीर्वाद लें। उनसे सलाह लें क्योंकि हमारे बड़े बुज़ुर्ग तजुर्बेकार होते हैं। वह हर उस दौर से गुज़रे हैं जहाँ हम अभी गुज़र रहे हैं। उन्हें हमसे ज्य़ादा अनुभव है। वह हमेशा हमें अच्छी सलाह देंगे। हमारे बड़े-बूढ़े हमेशा हमारा भला सोचते हैं कभी बुरा नहीं। यह बात सुनकर पूरे गाँव वाले अपने बुज़ुर्गों को घर वापस ले आते हैं। पूरे गाँव में यह ऐलान किया जाता है कि आज से ये प्रथा बंद। हमें अपने बुज़ुर्गों का सम्मान करना चाहिए। जब बुढ़ापे में उन्हें हमारी ज़रूरत है तो हमें उनकी पूरी देखभाल करनी चाहिए और उनका हाथ थामना चाहिए जैसे उन्होंने बचपन में हमारा हाथ थामा था। बूढ़ी माँ और घमंडी बेटे की कहानी यह कहानी है बेंगलुरू में रहने वाले रमेश की। रमेश अपने परिवार के साथ बैंगलोर में रहा करता था। परिवार में रमेश की माँ और रमेश की पत् नी तथा देा बच्चे भी रहा करते थे। रमेश की माँ सावित्री बहुत ही बूढ़ी हो चुकी थी और अपने पति के गुजर जाने के बाद बहुत अकेली भी। रमेश एक अमीर आदमी था पर वह अपनी माँ के इस बुढ़ापे की उम्र में उनकी ज़रूरतों को समझ पाने में असमर्थ था। वह भौतिक ज़रूरतें पूरी कर पाता था मगर इमोशनल सपोर्ट नहीं दे पाता था जिसकी उसकी माँ को इस उम्र में बहुत ज़रूरत थी। रमेश का घर चार मंजिल का था। उसने अपनी माता के लिए तीसरे मंजिल में कमरा तैयार कर रखा था। उस कमरें में सारी सुख सुविधाएं थी। सभी सुख सुविधा होने के बावजूद भी उसकी माँ हमेशा परेशान और मायूस रहा करती थी। वह अकेली रहती थी उसके साथ बात करने वाला कोई नहीं था वही अपने परिवार का साथ चाहती थी। पर यह बात रमेश को समझ नहीं आ रही थी रमेश और उसकी पत्नी लीला को यह लगता था कि हम तो अपनी बूढ़ी माँ को सारी सुख सुविधाएं उपलब्ध करवाते हैं। किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है फिर भी यह सासू माँ हमेशा ही नाराज़ परेशान और ना खुश क्यों रहती है अक्सर इस बुढ़ापे में वह हमसे क्या चाहती हैं? ऐसा सावित्री की बहू लीला ने सोचा। एक दिन सावित्री ने अपने बेटे रमेश से जि़द्द की कि उसका बिस्तर पहली मंजिल में लगवा दे। माँ के कई दफा कहने पर रमेश ने उनका बिस्तर नीचे मंजिल में लगवा दिया। अब सावित्री नीचे मंजिल में खुश रहने लगी। उसके स्वभाव में बेहद परिवर्तन आने लगा। यह देख रमेश हैरान हुआ कि ऊपर तीसरी मंजिल में भी उन्हें हर एक सुख सुविधा मैने दे रखी थी। फिर भी वह मेशा नाखुश और डिप्रेस्ड रहती थी। पर यह ऐसा क्या हुआ जो अब माँ हंसने लगी है खुश रहने लगी है। दरअसल सावित्री की खुशी का राज़ पहली मंजि़ल में अपने पोते पोतियों को आते-जाते देख और उनके साथ खेल पाने की थी। यह खुशी उसे तीसरी मंजि़ल में रहकर नहीं मिलती थी क्योंकि वहाँ बच्चों का और परिवार का आना-जाना बहुत कम था और वो ना ही इतनी सीढिय़ां चढ़ उतर सकती थी। अब सावित्री के पोते पोतियां भी उसके साथ खेलते थे। उनके साथ खेलते खेलते अब वह धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगी और सावित्री के चेहरे पर पहले जैसी खुशी वापस आने लगी। वह अपने बच्चों के लिए कभी पकोडिय़ां तो कभी मालपुए बनाया करती थी। अब बच्चे भी अपनी दादी के साथ खुश रहने लगे यह सब देख रमेश आश्चर्यचकित रह गया कि माँ की तबीयत में इतना सुधार आखिर कैसे जो यह महंगी मंहगी दवाईयां न कर पाई बल्कि परिवार के साथ थोड़ा सा समय बिताने पर ही उनकी सेहत में बहुत ज्य़ादा सुधार दिखने लगा। अब वह यह बात समझ गया कि बुढ़ापे में हमें भौतिक सुख-सुविधाओं से ज्य़ादा अपनों का प्यार और अपने परिवार के साथ की ज़रूरत होती है। बूढ़े और बच्चे एक समान होते हैं उन्हें बच्चों की तरह प्यार और देखभाल की आवश्यकता होती है। रमेश को अपने किए पर पछतावा हुआ उसे घमंड था कि वह तो अपनी माँ को हर एक सुख सुविधा देता है। पर इस भौतिक सुविधाओं के दिखावे के चक् कर में वह अपनी माँ को असली सुख-सुविधा देना भूल गया था जो था अपने मातापिता का बुढ़ापे में हाथ थामना जैसे उन्होंने बचपन में हमारा थामा था।

सीख : इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है कि हमारी दुनिया अपने माता पिता के चरणों में होनी चाहिए और उन्हें भौतिक सुख के साथ साथ परिवार का प्यार और बुढ़ापे मे एक इमोशनल सपोर्ट की ज़रूरत होती है क्योंकि हमारे बुजुर्ग इस उम्र में अक्सर अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं और इस वजह से उन्हें कई सारी मानसिक बीमारियों का सामना भी करना पड़ सकता है इसलिए जैसे हम एक छोटे से बच्चे की देखभाल करते हैं बुढ़ापे में हमारे बुजुर्गों को भी उस तरह की ही देखभाल की ज़रूरत होती है।

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