व्यर्थ संकल्प चलने का कारण ईष्र्या है, इससे बहुत नुकसान होता है। इसको सर्विस का चान्स दिया जाता, मेरे को नहीं। शायद इनको मेरे ऊपर फेथ नहीं है। दूसरों को आगे बढ़ता देख फीलिंग में आते रहते। बाहर में दिखाते पुरुषार्थ की शुभ भावना लेकिन अन्दर में है ईष्र्या। समानता में एक-दो को देख सहन नहीं होता। अगर हम अपने बाबा को सामने रखें तो बाबा ने कभी भी यह नहीं कहा कि यह बच्चे मेरे से भी आगे न जायें। बाबा तो हमेशा यह कहते, बच्चों तुम मेरे से भी आगे जा सकते हो, हाई जम्प दो। तो हम दूसरों को आगे बढ़ता देख ईर्ष्या क्यों करते? ईर्ष्या पहले संकल्प में आयेगी, नयनों में आयेगी, फिर वर्णन और कर्म में आयेगी। जब निमित्त शब्द भूलता तब ईष्र्या आती है। तुम्हारे से हुआ या मेरे से हुआ, हुआ तो बाबा का काम। तो मेरे में ईष्र्या क्यों? बड़ी बड़ाई बाबा की है, मेरे में यह भावनाएं उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। जिसके अन्दर ईर्ष्या है उसे बाबा की याद का रस मिल नहीं सकता। याद का चार्ट बढ़ नहीं सकता। ईष्र्या वाले का खाता घाटे में जाता, जमा नहीं हो सकता। अगर अपने खाते को जमा रखो तो व्यर्थ समाप्त हो जाए। जब जीवन बाबा को दिया तो छोटी-छोटी बातों के पीछे अपनी महानता कम क्यों करते? हमें बाबा के लव में लीन रहना है, यह ऐसा क्यों हुआ, इसने ऐसा क्यों किया। मैं अपने संकल्पों के खज़ाने को इसमें क्यों गँवाऊं? मैं अपना जमा करूँ, मैं सम्पन्न बनूँ, मैं दूसरे की फिक्र क्यों लूँ? बाबा कहता श्रीमत के आज्ञाकारी बनो, तो क्या यह श्रीमत की आज्ञा हुई? एक-एक संकल्प भी फरमान के अनुसार हो तो संकल्प दूसरी बातों में व्यर्थ जा नहीं सकते।
बाबा की श्रीमत है कि अब मन का रोना बन्द करो। उदास होना भी दास बनना है। उदास होना अर्थात् दास बनना। यह हमारे ज्ञान के विरुद्ध है। विरुद्ध बात क्यों होती? हम सब विश्व सेवा के निमित्त हैं। भक्तों को भी हमें भटकने से छुड़ाना है तो खुद क्यों भटकते? दास होना माना भटकना। हम किसी बात के दास क्यों बनें? मूड ऑफ हुआ माना बाबा से कनेक्शन ऑफ। बाबा सेे कनेक्शन टूटा तो बाकी हम ब्रह्माकुमार-कुमारी किसलिए? भले हम बिल्कुल राइट हैं परन्तु किसी बात के कारण मैं ऑफ हुई तो कमाई किसकी गई? मैं क्यों ऑफ रहूँ जो मेरी कमाई खत्म हो! मैं गँवाने वाली हूँ या जमा करने वाली हूँ? दूसरे की बात भले 100प्रतिशत रॉन्ग है, परन्तु दूसरे की रॉन्ग बात में मैंने अपना चार्ट क्यों खराब किया? आपस का एक शब्द भी सहन नहीं होता। दूसरे 100 गाली दें तो भी सहन कर लेते।
बाबा ने श्रीमत दी है बच्चे, कभी भी परचिंतन नहीं करो। यह आज्ञा है। फिर मैं किसी के चिंतन में चिन्तित क्यों बनूँ? मैं किसी को ऐसा साथ क्यों दूँ? मैं अपना परचिंतन में टाइम क्यों दूँ? क्या उससे आगे वाले को शक्ति मिलेगी? कोई समाचार मैंने वर्णन किया, उसका फल क्या हुआ? सुनने वाले को शॉक आया या उसकी उन्नति हुई? जिसको सुनाया उसका टाइम वेस्ट किया, अपना भी किया। उसे शॉक आया, उसके दिल में गलत इम्प्रेशन पैदा किया। बाबा की मैंने अवज्ञा की, तो मैंने सेवा की या डिससर्विस की? मैं जो बोलती वह बाबा ने बोलने की आज्ञा दी है? अगर नहीं तो मैं क्यों वर्णन करूँ! जब बाबा ने मना किया है समाचार की लेन-देन नहीं करो तो मैं क्यों करूँ? मेरे द्वारा दूसरे को दु:ख हुआ तो मुझे भी उसका रिटर्न दु:ख मिलेगा। घर छोड़ा, दुनिया छोड़ी, बाबा के द्वार में भी ऐसे रहे तो दूसरे द्वार पर क्या करूँगी? बाबा ने कहा अहम्, वहम् को छोड़ो तो रहमदिल बन जायेंगे।
अपने खाते को जमा रखो तो व्यर्थ समाप्त हो जाए
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