संगमयुग के इस पार्ट में हमें गंगा, जमुना और सरस्वती बनना है। गुप्त रूप में सरस्वती बनने बिगर पतित-पावनी गंगा बन नहीं सकेंगे। जमुना के कंठे पर राज्य नहीं कर सकेंगे। तो जो सदा मात-पिता को सामने रखते हैं वो सुख घनेरे पाते हैं, उनको अल्पकाल का सुख भासता ही नहीं है इसलिए वो सुख उन्हें चाहिए ही नहीं। जिसको इच्छाओं की अविद्या है वो महान श्रेष्ठ आत्मा है। अल्पकाल के सुख की इच्छा के लिए इतना बड़ा भाग्य गँवाना, यह कितना दुर्भाग्य है। तो एक मात-पिता की कृपा हो तो उसको और कुछ नहीं चाहिए।
बाबा भी हमारे ऊपर पहले दया करता, फिर रहम और कृपा करता। दया की जो गोद बिठाया, रहम ने दिल पर बिठाया फिर कृपा हमारे सिर पर है। कृपा मात-पिता की, दया स्वयं ईश्वर की, बाबा के पास कितने खोटे कर्म करके आये फिर भी बाबा रहमदिल बन करके अपना बनाके हमको शिक्षा दे-दे करके सुधार देता है। यह बाबा का रहम है, कृपा से पढ़ाई अच्छी पढ़ रहे हैं। उसकी कृपा न होवे तो दिमाग काम नहीं कर सकता है। वो ऊंट पक्षी की तरह होंगे। अभी सत्य बाबा से सत्य नारायण की कथा सुनते-सुनते हमारी बुद्धि ठीक काम करने लगी है। पहले भी सत्यनारायण की कथा सुनते थे, पर अर्थ का पता नहीं था। अभी हमको सत्कर्म करके ऐसा शालिग्राम बनना है जो शिव के साथ हमारी पूजा हो सके।
सत्यनारायण की कथा बताती है कि तुम सच्चे बनो तो नर से नारायण, नारी से श्रीलक्ष्मी बनेंगे। नारायण, लक्ष्मी से अलग नहीं है, लक्ष्मी, नारायण से अलग नहीं है। बाबा ने हमें लक्ष्य ही दिया है विष्णु(लक्ष्मी-नारायण) बनने का। मनमनाभव में बुद्धि ऊपर जाती है, मध्याजीभव होने से हर समय लक्ष्य सामने रहता है। विष्णु कहने से चार भुजा याद आती है, सिर्फ नारायण कहने से नहीं याद आती है।
अभी अगर किसी को विष्णुपुरी में आना है, विष्णुवंशी बनना है, सतयुग में आना है तो चार भुजाधारी बनना है। पहले है चक्र स्वदर्शन का, फिर गदा ज्ञान-योग की पराकाष्ठा का, फिर कमल का फूल एकदम न्यारा, रचना है परन्तु न्यारा है बहुत। जब इतना न्यारापन हो तब शंखध्वनि कर सके। इसका प्रैक्टिकल प्रमाण चाहिए। औरों को देखकर मैं भी यह बन सकता हूँ, यह उनके अन्दर में संकल्प हो। तो पुरानों को अभी समय का कदर करके बाबा को सबूत देना है। अभी भी सबूत देने का ख्याल नहीं आयेगा तो क्या होगा? कई आत्माओं को वरदाता का वरदान है। स्वराज्य पद पाने के पहले वर्सा, वरदान याद रखना है। बाबा ने जो दिया है उससे सेवा ऑटोमेटिक होती रहे। व्यर्थ सोचने, बोलने, समय गँवाने से ऐसी सेवा नहीं हो सकती है इसलिए सच्चा सेवाधारी बनना है तो स्वयं पर ध्यान रखना है। अभी योग में एक सेकण्ड के अन्दर बुद्धि इतनी शांत हो जाये जो स्वीट साइलेंस में चली जाये, फिर वो वायुमण्डल भी सबको अच्छा लगेगा।
जब न्यारापन हो तब शंखध्वनि कर सकें
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