मुख पृष्ठदादी जीदादी प्रकाशमणि जी'हम किसके हैं' ये स्मृति रहने से माया आ नहीं सकती

‘हम किसके हैं’ ये स्मृति रहने से माया आ नहीं सकती

बाबा ने हमारा तीसरा नेत्र खोल दिया। देहधारियों को देखने वाला नेत्र ही नहीं है। अगर अपने को ओबीडिएन्ट समझते तो इसमें ओबीडिएन्ट बनो।

कोई कहे मोह नहीं टूटता तो कहो हे बाबा मैंने नष्टोमोहा का मन्त्र नहीं पढ़ा है… कहते हैं देहधारियों में वृत्ति जाती है, मेरा सवाल उठता क्यों? आप कहते हम कोशिश करते, मैं कहती तुम ओबीडिएन्ट नहीं। आप कहते हम पुरूषार्थ करते, मैं कहती तुम कुछ नहीं करते। निश्चयबुद्धि ही नहीं हो। पूरा निश्चयबुद्धि कब बनेंगे? क्या मरने के बाद? निश्चयबुद्धि विजयन्ती अभी की बात है या बाद की? क्या बाबा के यह बोल रॉन्ग हैं कि बच्चे निश्चयबुद्धि विजयी। अगर नहीं तो कम्पलीट विजयी बनकर दिखाओ।
अगर मैं किसी में अटैच होऊंगी तो क्या दूसरे को पावन बना सकूँगी! खुद फंसा हुआ दूसरे को फांसी से कैसे छुड़ायेगा! जब न्यूज़ सुनते कि फलाने को फांसी की सजा मिली तो ख्याल आता फांसी! लेकिन जब खुद कहते मेरे से यह विकार जाता नहीं, वृत्ति जाती नहीं तो यह भी तो फांसी की सज़ा है। फांसी के तख्ते पर लटके हुए हो। अगर आज फांसी के तख्ते से उतर बापदादा के दिल तख्त पर नहीं बैठे तो फिर कब बैठेंगे!
मैं तो कहती हूँ- माया तू मेरे पास क्यों नहीं आती! मुझे भी तो कुछ अनुभव करा। मैं तो माया को चैलेंज करती हूँ, मैं अपने बाबा की हूँ, मैं दुनिया की थोड़े ही हूँ। आप दुनिया को देखते हो तो वह ऐसे-ऐसे करती है। हमारे पास दुनिया को देखने के लिए आँखे हैं ही नहीं। बाबा ने हमारा तीसरा नेत्र खोल दिया। देहधारियों को देखने वाला नेत्र ही नहीं है। अगर अपने को ओबीडिएन्ट समझते तो इसमें ओबीडिएन्ट बनो।
ओबीडिएन्ट माना आज्ञा पालन करने वाला, फेथफुल। मैं अगर ओबीडिएन्ट हूँ तो बाबा के डायरेक्शन के खिलाफ यह सब मेरी गलतियां क्यों होती। जब हम सर्वेन्ट हैं तो सेठ की बात क्यों नहीं मानते। जब सेठ से बुद्धि हट जाती तो भाव-स्वभाव में आकर झगड़ा करते। बाबा कहता बच्चे निर्मान बनो, नम्र बनो और हम होते गर्म। तो क्या मैं ओबीडिएन्ट हुई! हमें तो बहुत-बहुत मीठा बनना है।
कई ऐसे भी हैं जो अनुमान की दुनिया बनाकर बैठते हैं। भूख होती है मान की, फिर बातें दूसरों की अनु जैसी निकालते रहते। फलाना ऐसा है, फलाना ऐसा बोलता, कई बार मिसअन्डरस्टैंडिंग में अनुमान का शिकार हो जाते हैं। अनुमान की बीमारी कईयों को शिकार कर मार देती है। अन्दर समझते फलाने ने मुझे इस नज़र से देखा, वह मेरे लिए ऐसा सोचता… मैं तो ऐसे इज्जत से चलने वाला हूँ। मुझे यह ऐसा कहते, फिर जाकर घर में बैठ जायेंगे, तो शिकार हो गये ना। मुरली में तो बाबा ने ऐसे कभी नहीं कहा कि तुम जाकर घर बैठ जाओ। मिसअन्डरस्टैन्ड में मिस हो जाते। अरे तुम कुमार-कुमारी रहो, मिस क्यों बनते! बाबा ने हमें सीढ़ी उतरने से बचा लिया, अकेला हूँ, अकेले का हूँ, न कोई दुश्मन है, न किसी से द्वेष है। हम कितने लकी हैं, एक के हैं, एक हैं, अपने लक की महिमा करो। मुझे बचा लिया बाबा ने… फिर क्यों कहते वृत्ति जाती? इन्हें दूध पिलाकर मोटा नहीं करना। इन्हें समाप्त करके जाओ। बुद्धि में दृढ़ता हो कि हम किसके हैं तो माया आ नहीं सकती। आप उनका स्वागत क्यों करते हो? दरवाजा क्यों खोलते! स्वागत करेंगे तो मार डालेगी। हमारा जन्म बदला, हमारा नाम, धर्म, कुल, कर्म, सम्बन्ध सबकुछ बदल गया। हम सारी दुनिया से बदल गये, हम इस दुनिया को देखें ही नहीं।

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