ज्ञान राजा बनकर नहीं शिष्य बनकर लें

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उस नगर का राजा पढ़े-लिखे नहीं थे, इसलिए उन्हें अच्छा नहीं लगता था। क्योंकि वह सोचते थे कि अगर मुझे पढऩा आ जाये तो बहुत अच्छा होगा। इसलिए राजा ने सोचा कि मुझे अब से ही यह निर्णय लेना होगा। वह अपने मंत्री को बुलाते हैं उससे बात करते हैं, मंत्री कहता है कि आप चिंता न करें, मैं आपके लिए जल्द ही किसी गुरू का इंतज़ाम करता हूँ।
राजा ने कहा कि वह गुरू बहुत ज्ञानी होने चाहिए। यह सुनकर मंत्री कहते हैं कि आप चिंता न करें, ऐसा ही होगा। मंत्री अच्छे गुरू की तलाश में जाते हैं, यह तलाश दो दिन बाद पूरी होती है। वह गुरू आते हैं वह राजा से कहते हैं कि यह गुरू बहुत ज्ञानी हैं, इन्हें बहुत ज्ञान है। राजा कहते हैं कि इन्हें हमारे महल में ठहरने के लिए पूरा इंतज़ाम किया जाये। अगले दिन गुरू राजा को ज्ञान देने के लिए पढ़ाना शुरू करते हैं।
जब एक महीना बीत जाता है तो राजा को कोई भी ज्ञान नहीं मिल रहा था, वह परेशान थे। क्योंकि गुरू तो उन्हें पढ़ा रहे थे मगर उन्हें कुछ भी नहीं आ रहा था। राजा यह बात गुरू से नहीं पूछ सकते थे क्योंकि वह बहुत ज्ञानी थे। राजा ने यह बात अपनी पत्नी को बताई। उसके बाद पत्नी ने कहा कि यह बात आपको गुरू ही बता सकते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है!
अगले दिन राजा गुरू से पूछते हैं कि आप बहुत ज्ञानी हैं। आपको सभी तरह का ज्ञान है मगर मुझे ज्ञान क्यों नहीं मिल रहा है। यह सुनकर गुरू कहते हैं कि बात बहुत छोटी है मगर इस बात में गहराई छुपी है। मैं आपको बताना चाहता था मगर कह नहीं पाया था। राजा कहते हैं कि आप मुझसे कह सकते हैं। गुरू राजा से कहते हैं कि आप जब भी शिक्षा ग्रहण करने आते हैं तो आप सिंहासन पर बैठ जाते हैं मुझे नीचे बिठा देते हैं क्योंकि आप राजा हैं यही अंतर है। अब राजा को समझ आ गया था कि जब तक वह बड़े होने का घंमड दूर नहीं करते हैं उन्हें ज्ञान नहीं मिल सकता। उस दिन से राजा ने गुरू को ऊपर का स्थान दिया, अब राजा को सबकुछ धीरे-धीरे आने लगता है क्योंकि उन्हें अब पता चल गया है जीवन में घमंड नहीं करना चाहिए।

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