मुख पृष्ठब्र. कु. सूर्यपवित्रता द्वारा सर्व प्राप्तियां…

पवित्रता द्वारा सर्व प्राप्तियां…

जिन्होंने देहधारियों से देह के सम्बन्ध हल्के कर दिए, पवित्रता का नाता जोड़ दिया, जो देह भान से न्यारे होने लगे, वे परमात्मा को भी आकर्षित करने लगे। उन पर उनकी कृपा बरसने लगी। सुख-शान्ति संपन्न जीवन हो गया। जीवन में खुशियां छा गई। तो हम ये देख सकते हैं, ये अनुभव कर सकते हैं कि प्युरिटी ही इन सभी प्राप्तियों को अनुभव करने का आधार है।

पछले अंक में आपने पढ़ा कि ब्रह्मचर्य से शुरू होकर मन की शुद्धि, स्वप्नों तक भी पवित्रता, दृष्टि भी पवित्र, वृत्ति भी पवित्र, विचार भी पवित्र, वायब्रेशन्स भी पवित्र, कोई व्यर्थ संकल्प नहीं, इसके बहुत सारे लेवल बनाते हैं। जिसका लेवल जितना ऊंचा उठता जाता है। उसका जीवन उतना ही अनुभूतियों की खान बनता जाता है। अब आगे पढ़ेंगे…
प्रभु मिलन की अनुभूति, कर्म क्षेत्र पर रहते हुए सुख-शान्ति की अनुभूति, पवित्रता को सहज अनुभव करने की अनुभूति। अनेक समस्याओं, चिन्ताओं और बाधाओं में सहज ही हल्के रहने की, परमात्म सहयोग की, उसके साथ की अनुभूति, परमात्म प्रेम की अनुभूति, उससे प्राप्त शक्तियों की अनुभूति, उसकी दुआओं की अनुभूति, इन सब अनुभूतियों का आधार मनुष्यात्मा की प्युरिटी है, क्योंकि भगवान परम पवित्र है, पवित्र आत्माएं ही उसको खिंचती हैं और पवित्र आत्मायें ही उसके प्युअर वायब्रेशन्स को खिंचती हैं। पवित्र आत्मायें भगवान को सबसे ज्य़ादा प्रिय हैं। जिन्होंने देहधारियों से देह के सम्बन्ध हल्के कर दिए, पवित्रता का नाता जोड़ दिया, जो देह भान से न्यारे होने लगे, वे परमात्मा को भी आकर्षित करने लगे। उन पर उनकी कृपा बरसने लगी। सुख-शान्ति सम्पन्न जीवन हो गया। जीवन में खुशियां छा गई। तो हम ये देख सकते हैं, ये अनुभव कर सकते हैं कि प्युरिटी ही इन सभी प्राप्तियों को अनुभव करने का आधार है। प्युरिटी इस कल्प वृक्ष का भी आधार है। जिस धर्म की स्थापना जब भी हुई तो प्युरिटी से ही प्रारम्भ हुई। धर्म पिता, पवित्र आत्माएं ही आयीं थी। अनेक धर्मों में दिखाया गया, एंजेल्स आये, फरिश्तों ने प्रवेश किया, ज्ञान दिया, ये सब पवित्र आत्माएं थीं। धीरे-धीरे उस धर्म के अनुयायी पवित्रता को भूलते गए। बाहरी सिद्धान्तों में अटक कर रह गए। समय बदला, कई विषयी लोग पैदा हो गए हर धर्म में, उन्होंने धर्म के रूप को विकृत कर दिया और संसार में अब धर्मों की लोवेस्ट स्थिति है। सब आपस में लड़ते हैं। वैमनस्य है, घृणा है, प्रेम नहीं रहा, जबकि सभी यही ज्ञान देते हैं कि तुम रूह हो, तुम आत्मा हो, तुम सोल्स हो, वो तुम्हारा सुप्रीम सोल सुप्रीम फादर है। हम सब उनकी सन्तान हैं। तो एक परिवार हो गया। तो आपस में बहुत ही प्यार होना चाहिए। निश्चित रूप से होना चाहिए। लेकिन पवित्रता की कमी सबको देह भान में ले आई। और सभी सोचने लगे कि मेरा धर्म बड़ा। तुम्हारा झूठा, मेरा सच्चा। ये बिना मतलब के झगड़े प्रारम्भ हो गये। घृणा भाव पैदा हो गया, इनसे बचना है। अब समय आ गया है, सभी आत्माओं को अपनी मूल पवित्र स्थिति में पहुंचना ही है क्योंकि सबके घर जाने का, वापिस परमधाम जाने का, रूहों की दुनिया में जाने का समय आ गया है। तो ये खेल पूरा होने को है। सबके हिसाब-किताब भी यहाँ चुक्तू होंगे। कर्मों का हिसाब-किताब सबको देना पड़ेगा। तब पावन बनकर सब आत्माएं ऊपर जायेंगी। चाहे भगवान के मिलन का अनुभव आप करना चाहते हैं, चाहे जीवन को सुख-शान्ति से भरना चाहते हैं। तो पवित्रता को धारण करें, पवित्रता के लेवल को बढ़ाते चलें। अगर मन में सूक्ष्म में भी अपवित्रता रहेगी, अपवित्र इच्छायें रहेंगी, यदि हम इच्छाओं को दबा कर रखेंगे, उन्हें नष्ट नहीं करेंगे, तो कहीं न कहीं समस्यायें बढ़ेंगी, जीवन में विघ्न आतें रहेंगे। अगर हमारे पास पॉवर ऑफ प्युरिटी है, तो प्रकृति भी हमें सम्पूर्ण मदद करेगी, प्रकृति का सम्पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा। धन की भी कमी नहीं होगी। सुख-शान्ति से जीवन, परिवार भरपूर हो जायेगा।

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