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त्याग क्यों करें?

यहाँ त्याग करना है अपनी उन सूक्ष्म कमज़ोरियों का, जो हमारी साधनाओं के मार्ग में बाधाएं हैं। जैसे बहुत सारी सांसारिक इच्छाएं। कर्म करते-करते ऐसी स्थिति पर आ जाओ, हमें कुछ नहीं चाहिए, अब सब कुछ एक शिवबाबा से लेना है।

लास्ट सो फास्ट जाने वालों के लिए कुछ और सहज पुरूषार्थ की विधियां हैं। यदि सचमुच सच्चे दिल से आपके मन में लगन है, (सच्चे दिल के लगन की बात कर रहे हैं) कि मैं लास्ट में आया हूँ/आयी हूँ। मुझे बाबा से सब कुछ प्राप्त करना है। बहुत दिनों से भगवान से मिलने की इच्छा थी, बहुत भक्ति की थी। अब उसे मिलन हो रहा है तो ये मिलन निरन्तर होता रहे, आत्मा अतिन्द्रिय सुखों का भण्डार बन जाए, मुझे अब ये करना है। यदि सच्चे दिल का ये संकल्प है, तो ध्यान देंगे बिना त्याग के बड़ी प्राप्तियां नहीं हुआ करती, इसलिए अपने को त्याग करने के लिए तैयार करो।

आप सब जानते हैं यहाँ घरबार, बाल-बच्चों की त्याग करने की ज़रूरत नहीं है। यहाँ त्याग करना है अपनी उन सूक्ष्म कमज़ोरियों का, जो हमारी साधनाओं के मार्ग में बाधाएं हैं। जैसे बहुत सारी सांसारिक इच्छाएं। कर्म करते-करते ऐसी स्थिति पर आ जाओ, हमें कुछ नहीं चाहिए, अब सब कुछ एक शिवबाबा से लेना है। इस संसार से हमें कुछ नहीं चाहिए, इसको सर्वस्व त्याग कहेंगे। सोच लो आप इसके लिए तैयार हैं?

दूसरा त्याग- कर्मेन्द्रियों के रसों का त्याग। पहले कोई खाने-पीने में रहते थे, कोई व्यर्थ सुनने में रहते थे, किसी को बहुत कुछ देखने का शौक था, कोई बहुत पढ़ाई भी करते रहते थे, सारी दुनिया की नॉलेज ले रहे हैं। किसी को कहीं इन्ट्रेस्ट था, किसी को कहीं। अब अपने को अन्तर्मुखी करना है। पढ़ाई तो स्वयं भगवान पढ़ा रहा है जो सभी विद्याओं का सार है। राजयोग की विद्या संसार के सभी विद्याओं का सार है। भगवान से शक्तियां लेने के बाद और कुछ जानने की इच्छा नहीं रहती। सुनना है तो सुनो भगवान को। (जो मुझे सुनेंगे तो वो कहेंगे क्या बात कर रहे हैं बड़ी-बड़ी? कल्पना लगती है।) भगवान को सुनने का समय चल रहा है, वो सत्य ज्ञान दे रहा है, उसकी वाणी चल रही है। ये ज्ञान देकर वो हमें राह दिखा रहा है, उसकी सुनो। त्याग करना है तो एक व्यर्थ की इच्छाओं का, अच्छी इच्छाओं का नहीं। एक कर्मेन्द्रियों के रसों का। साथ में जोड़ दें आलस्य और अलबेलेपन को। सवेरे उठने में आलस आता है। कोई एक बहन कल आई। मैं आठ बजे उठती हँू सोके। बहुत प्रतिज्ञाएं कर ली चार बजे उठने की, सफल ही नहीं हुई। मैंने उससे पूछा कितने बजे सोती हो। कहा- दस बजे। मैंने कहा कि दस बजे सोके, चार बजे उठना इस आयु में तो सहज बात है। अच्छी आयु थी 40-45 साल की, तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। अलार्म नहीं लगाती हो क्या? अलार्म लगा लिया करो। कहा कुछ सुनता नहीं। ऐसी नींद आती है कि जैसे कि बस मर गई हूँ, कुछ सुनाई नहीं देगा। मैं समझ गया कि इसका कारण होता है कुछ। ब्रेन की डलनेस, ऑक्सीजन की कमी और सूक्ष्म विकर्मों का बोझ भी। जो आत्मा को सवेरे-सवेरे का ईश्वरीय सुख नहीं लेने देता।

तो बहुत ध्यान दें, जल्दी सोना, जल्दी उठना इसको अपना नियम बना लें। भगवान सवेरे-सवेरे अमृत बांटता है, वरदान बांटता है, सुख-शान्ति, खुशी-प्रेम का अनुभव कराता है, अपनेपन की फीलिंग देता है। भगवान ही हमारा है। हम उसके भक्त नहीं, हम तो बहुत प्यारे-लाडले बच्चे हैं ये वो फीलिंग देता है।

तो जिसको लास्ट सो फास्ट जाना है वो इस चीज़ पर बहुत ध्यान दें कि हमें सवेरे उठके परमात्म मिलन का सुख लेना है, उसको शुक्रिया किया करें तो उसके प्यार में मन मगन होता रहेगा। उससे क्षमा-याचना भी कर लें ज्य़ादा पाप कर लिए हों। ज्य़ादा विषयी जीवन रहा हो, ज्य़ादा गड़बड़ कर ली हो जीवन में, कइयों ने की है बहुत गड़बड़, वो गड़बड़ करने वाले सब जानते हैं, हमने क्या-क्या गड़बड़ की। एक तो उसे भूलाना पड़ेगा, तो ये चीज़ें भूलना सहज भी नहीं होता है, यह भी सत्य है। भूलाना तो पड़ेगा। लेकिन आगे ऐसा कुछ न हो ये प्रतिज्ञा भी करनी पड़ेगी।

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